Skip to main content

आलेख

सोशल मीडिया और राष्ट्रीय संप्रभुता

नेपाल में सोशल मीडिया बैन को लेकर जारी विरोध केवल एक देश का मामला नहीं है, बल्कि यह पूरे विश्व के लिए चिंता का विषय है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने सूचना के आदान-प्रदान को सरल बनाया है, लेकिन आज यही माध्यम लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को अस्थिर करने का औजार भी बनता जा रहा है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराने वाली बड़ी कंपनियाँ अपने मुनाफ़े के लिए तो हर देश में सक्रिय रहना चाहती हैं, किंतु उस देश के कानून और नियमों का पालन करने से कतराती हैं। यह प्रवृत्ति राष्ट्रीय संप्रभुता के लिए सीधा खतरा है।

हाल के वर्षों में श्रीलंका, बांग्लादेश और अब नेपाल में देखा गया है कि किस प्रकार युवाओं के असंतोष को सोशल मीडिया पर उकसाकर बड़े आंदोलनों का रूप दिया गया। सत्ता परिवर्तन तक की कोशिशें इन माध्यमों से संभव हो रही हैं। इसमें केवल बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ ही नहीं, बल्कि विपक्षी दलों और अंतरराष्ट्रीय शक्तियों का भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हाथ रहता है।

यह स्थिति बेहद खतरनाक है, क्योंकि अब यह स्पष्ट हो चुका है कि सोशल मीडिया कंपनियाँ किसी भी देश की आंतरिक स्थिरता को प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं। फेक न्यूज़, अफवाह और नफरत फैलाने वाली सामग्री कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुँच जाती है। नतीजतन, सामाजिक समरसता और राजनीतिक संतुलन डगमगा जाता है।

इस खतरे से निपटने के लिए आवश्यक है कि प्रत्येक देश अपने डिजिटल कानूनों को सख़्ती से लागू करे और कंपनियों को स्थानीय नियमों का पालन करने के लिए बाध्य करे। साथ ही, नागरिकों—विशेषकर युवाओं—को डिजिटल साक्षरता दी जाए ताकि वे अफवाह और तथ्य में अंतर कर सकें।

समय की माँग है कि हम सोशल मीडिया को अभिव्यक्ति का मंच बनाएँ, न कि अस्थिरता का हथियार। अन्यथा, यह आभासी ताक़त वास्तविक दुनिया में अशांति का कारण बन सकती है।

Comments

Popular posts from this blog

मृत्यु का मोल। (कविता)

"मृत्यु का मोल" ( व्यंग्य कविता) अंजान मरे — तो चुपचाप साइड से निकल लो, ना आँसू, ना सवाल — बस भीड़ में खुद को बचा लो। पड़ोसी मरे — तो पूछ लो संस्कार का समय, कंधा न सही, कम से कम दिखा दो थोड़ा नमन। जान-पहचान वाला गया — तो फेसबुक पर "ॐ शांति" लिख दो, दिल से नहीं, टाइपिंग स्पीड से दुख नाप लो। कोई अपना गया — तो आँसू भी प्रॉपर्टी के वजन से गिरते हैं, ग़म भी वसीयत के काग़ज़ों में सुकून ढूंढता फिरता है। और जब आप मरें — तो सोचो, कौन रोएगा सच में? कौन होगा जो तुम्हारे बिना रातों को जागेगा? मौत तो सबकी बराबर होती है — पर इस दुनिया में दुख भी रिश्तों के रैंक से बाँटा जाता है। डॉ दिलीप बच्चानी  पाली मारवाड़,राजस्थान।
अचानक नही टूटा हूं कब से दरक रहा था। कोई समझ नही पाया नजर का फरक रहा था। कही उसे देख न लू चुपके से सरक रहा था।