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बसंत पंचमी

बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं।  शब्दों के जन्म से पहले जो मौन बोल उठता है, विचारों की पहली धड़कन में जिसका स्पर्श टहलता है वही तुम हो, माँ सरस्वती। श्वेत नहीं, तुम पूर्वाग्रहों से मुक्त चेतना हो, जहाँ ज्ञान अहंकार नहीं विनय ओढ़कर आता है। वीणा के हर तार में अनुशासन नहीं, संतुलन का संगीत है कि शिक्षा हृदय के बिना केवल शोर है। हंस तुम्हारा वाहन नहीं, तुम्हारी सीख है सब जान लेना सरल है, सही चुन पाना एक साधना। शोर में नहीं मिलतीं तुम, भीड़ में नहीं बसतीं, जहाँ मौन सीखने लगे वहीं उतर आती हो माँ सरस्वती। हमें अक्षर नहीं चाहिए, दृष्टि दो माँ कि अँधेरों में भी सत्य को पहचान सकें। डॉ दिलीप बच्चानी  पाली मारवाड़, राजस्थान।
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उतारन ऐ चड़ावन जी कहानी आहे सीदी सादी जिंदगी बेस्वाद, बेमानी आहे।  कहिंखे घट कहिंखे वधिक मालिक़ डिनो आ मा शुकर भी करा हिय त बेईमानी आहे। 

दायरों के पार, कविता।

दायरों के पार(कविता) कभी ठहर कर सोचा है, वाक़ई में तुम चाहते क्या हो? तुम्हारे पैरों की धड़कन में अभी भी बची है पहाड़ों की पुकार, नदियों का संगीत, और दूर तक फैली पगडंडियों का रहस्य। तुम्हारी सांसों में अब भी कैद है समंदर पार करने का साहस, अनंत आकाश छू लेने की इच्छा, और अजनबी रास्तों पर खुद को खो देने की आज़ादी। पर तुम— खुद को बाँध बैठे हो इन चमकते दायरों में— जहाँ गाड़ियों की गति मन की रफ़्तार नहीं बढ़ाती, जहाँ ऊँची इमारतें सपनों जितनी नहीं, बस अहं जितनी ऊँची होती हैं। जहाँ शराब की बोतलों में मदिरा से ज़्यादा थकान घुली होती है, और रातें नींद से नहीं— भागदौड़ के हिसाब–किताब से कटती हैं। बैंक की किश्तों में बंधा ये कृत्रिम जीवन, एक अदृश्य कारागार है— जहाँ समय भागता है, और तुम खड़े रह जाते हो। डर लगता है, कहीं ऐसा न हो कि सपने इंतज़ार करते रह जाएँ, और तुम गिनते रहो— किस्तें, बिल, तारीखें, जबकि जीवन चुपचाप निकल जाए किसी भूली हुई कैलेंडर की घड़ी से। उठो— अब भी देर नहीं, साल नहीं… सिर्फ़ एक निर्णय चाहिए। क्योंकि जीवन कमाया नहीं जाता, जिया जाता है। डॉ दिलीप बच्चानी  पाली मारवाड़ राजस्थान।

लेख।

हम कर सकते हैं, पर करते नहीं हैं जब हम घर से बाहर निकलते हैं, तो क्या अपने साथ पानी नहीं ले जा सकते? क्या बिना प्लास्टिक में बंद कुरकुरे और वेफर्स के हमारा दिन नहीं गुजर सकता? शादी-ब्याह या पार्टियों में क्या प्लास्टिक के गिलास और बोतलों की जगह कुल्हड़ या धातु के बर्तन इस्तेमाल नहीं किए जा सकते? निश्चित रूप से यह सब संभव है, परंतु सच्चाई यह है कि हम कर सकते हैं, पर करते नहीं हैं। आज प्लास्टिक हमारी जरूरत नहीं, आदत बन चुकी है। यह हर जगह है—खाने की पैकिंग से लेकर पानी की बोतलों तक। सबसे भयावह बात यह है कि यही प्लास्टिक धीरे-धीरे टूटकर माइक्रोप्लास्टिक बन जाता है, जो हमारी मिट्टी, पानी, हवा और यहाँ तक कि शरीर के भीतर तक पहुँच चुका है। विज्ञानियों ने पाया है कि हम प्रतिदिन अनजाने में लगभग एक क्रेडिट कार्ड जितना प्लास्टिक निगल लेते हैं। यह न केवल हमारे पाचन तंत्र, हृदय और हार्मोन तंत्र को प्रभावित करता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य पर भी गहरा असर डाल सकता है। हर साल लाखों टन प्लास्टिक कचरा नदियों और समुद्रों में बह जाता है। मछलियाँ, पक्षी और अन्य जीव इन्हें भोजन समझक...

आलेख

“मनुष्य और भौगोलिक परिस्थितियाँ” मनुष्य प्रकृति की संतान है। उसका जन्म, जीवन, संस्कृति, परंपराएँ और विचार — सब कुछ उस धरती और वातावरण से गहराई से प्रभावित होते हैं, जहाँ वह रहता है। भौगोलिक परिस्थितियाँ केवल जलवायु या भूमि तक सीमित नहीं होतीं, बल्कि वे किसी समाज की जीवनशैली, अर्थव्यवस्था, धर्म, भाषा और संस्कृति तक को आकार देती हैं। हर क्षेत्र का भोजन उसकी मिट्टी और जलवायु की उपज होता है। पंजाब की उपजाऊ भूमि में सरसों की बहुलता है, इसलिए वहाँ “सरसों का साग और मक्के की रोटी” प्रसिद्ध है। राजस्थान की शुष्क भूमि में तिल और बाजरा जैसे फसलें उगती हैं, इसलिए वहाँ के भोजन में “तीली का तेल” और “बाजरे की रोटी” प्रमुख हैं। दक्षिण भारत में नारियल की अधिकता के कारण “नारियल तेल” और “नारियल आधारित व्यंजन” का प्रयोग होता है। पहाड़ी क्षेत्रों में लोगों का भोजन ऊर्जावान होता है, जैसे घी, मक्खन, दूध और मांस — क्योंकि वहाँ अधिक श्रम और ठंड से निपटने के लिए शरीर को ऊर्जा चाहिए। धर्म या परंपरा से पहले भूगोल ने यह तय किया कि मनुष्य क्या खाएगा। रेगिस्तानी या बर्फीले क्षेत्रों में सब्ज़ियाँ, अनाज, फल नहीं मिलत...
दादा जी! आप इतने ठंडे मौसम में भी पँखा चला कर बैठे हैं।  बेटा ये खटर खटर करता हुआ पँखा मुझे गर्मियों में हवा देता है।  और बाकी मौसमों में बेकार की आवाजों से बचाता है।

दोहे

उतरा चेहरा देखकर, मुझसे बोली झील। छोड़ो अब बंधन मोह के, दे दो मन को ढील।। चाहे जितना ढूंढ लो, मिलती नहीं है छांव। दौड़-दौड़ के थक गये, अब रुके ये पांव।॥ खुश रहने का तू जरा,कर तो मन प्रयास फिर तुझको आ जाएंगी,पीड़ायें भी रास।