हमारी बेवकूफ़ियों का अंजाम ये हुआ, खड़े हैं आज फिर हम उसी मुकाम पर। हम अपने ही बनाए दायरों में क़ैद रहे, नज़र गई ही नहीं एक भी आयाम पर। जो सच था सामने, उससे नज़र चुरा बैठे, गुमाँ किए रहे बस अपने ही इल्हाम पर। हर एक बार वही दास्ताँ दोहराई है, ठहर गए हैं क़दम फिर उसी मुकाम पर। सफ़र में साथ जो था, आइना ही था अपना, मगर यक़ीं न किया हमने उसके पैगाम पर। उठे थे हाथ बदलने को अपनी तक़दीरें, मगर झुके ही रहे वक़्त के निज़ाम पर।
खत्म डाटा नही खत्म हम हो रहे है। कुछ मिल भी रहा है या सिर्फ खो रहे है। खत्म डाटा नही खत्म हम हो रहे है। रिश्ते जल रहे है हम सो रहे है। खत्म डाटा नही खत्म हम हो रहे है। सोचा है क्या उगेगा जो आज बो रहे है। खत्म डाटा नही खत्म हम हो रहे है। बेवजह का भार है जिसे ढो रहे है। खत्म डाटा नही खत्म हम हो रहे है।