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गजल

हर तारीफ़ में सच्चाई हो, ज़रूरी तो नहीं, पीठ पीछे लोग क्या-क्या नहीं कहते। सामने आकर तो सब हँसकर मिला करते हैं, दिल की बात मगर खुलकर नहीं कहते। चेहरे पढ़ना भी यहाँ आसान कहाँ होता है, लोग हर राज़ को सच-सच नहीं कहते। जिनसे उम्मीद थी साया भी बनेंगे मेरे, वक़्त आने पे वो अच्छा नहीं कहते। ख़ुद को आईना दिखाना भी गुनाहों सा लगे, लोग अपने ही को सच्चा नहीं कहते। ज़हर लफ़्ज़ों में घोलें तो हुनर मानें उसे, सीधी बातों को यहाँ अच्छा नहीं कहते। ‘दिलीप’ अब तो तजुर्बों ने सिखा दी ये बात, हर मुस्कान को हम सच्चा नहीं कहते। 
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गजल।

हमारी बेवकूफ़ियों का अंजाम ये हुआ, खड़े हैं आज फिर हम उसी मुकाम पर। हम अपने ही बनाए दायरों में क़ैद रहे, नज़र गई ही नहीं एक भी आयाम पर। जो सच था सामने, उससे नज़र चुरा बैठे, गुमाँ किए रहे बस अपने ही इल्हाम पर। हर एक बार वही दास्ताँ दोहराई है, ठहर गए हैं क़दम फिर उसी मुकाम पर। सफ़र में साथ जो था, आइना ही था अपना, मगर यक़ीं न किया हमने उसके पैगाम पर। उठे थे हाथ बदलने को अपनी तक़दीरें, मगर झुके ही रहे वक़्त के निज़ाम पर।

गजल।( डाटा)

खत्म डाटा नही खत्म हम हो रहे है।  कुछ मिल भी रहा है या सिर्फ खो रहे है।  खत्म डाटा नही खत्म हम हो रहे है।  रिश्ते जल रहे है  हम सो रहे है।  खत्म डाटा नही खत्म हम हो रहे है।  सोचा है क्या उगेगा जो आज बो रहे है।  खत्म डाटा नही खत्म हम हो रहे है।  बेवजह का भार है जिसे ढो रहे है।  खत्म डाटा नही खत्म हम हो रहे है। 

प्रेम

प्रेम : एक दर्शन प्रेम कोई दृश्य नहीं जिसे दिखाया जाए, वह तो दृष्टि है— जो देखने का सलीक़ा बदल दे। प्रेम शब्द नहीं जो बार-बार दोहराए जाएँ, वह मौन है— जो भीड़ में भी अर्थ रच दे। जहाँ अधिकार समाप्त होते हैं, वहीं प्रेम जन्म लेता है, क्योंकि माँग में नहीं, स्वीकार में उसका वास है। प्रेम प्रमाण नहीं चाहता, न साक्षी, न घोषणा, वह तो अहंकार के विसर्जन के बाद जो शेष बचता है—वही है। जो हर क्षण स्वयं को सिद्ध करे, वह आकर्षण हो सकता है, पर प्रेम नहीं— प्रेम तो खुद को भूल जाने का साहस है। इसलिए प्रेम प्रदर्शन नहीं, प्रेम दर्शन है— देखने का, जीने का, और चुपचाप हो जाने का तरीका।

बसंत पंचमी

बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं।  शब्दों के जन्म से पहले जो मौन बोल उठता है, विचारों की पहली धड़कन में जिसका स्पर्श टहलता है वही तुम हो, माँ सरस्वती। श्वेत नहीं, तुम पूर्वाग्रहों से मुक्त चेतना हो, जहाँ ज्ञान अहंकार नहीं विनय ओढ़कर आता है। वीणा के हर तार में अनुशासन नहीं, संतुलन का संगीत है कि शिक्षा हृदय के बिना केवल शोर है। हंस तुम्हारा वाहन नहीं, तुम्हारी सीख है सब जान लेना सरल है, सही चुन पाना एक साधना। शोर में नहीं मिलतीं तुम, भीड़ में नहीं बसतीं, जहाँ मौन सीखने लगे वहीं उतर आती हो माँ सरस्वती। हमें अक्षर नहीं चाहिए, दृष्टि दो माँ कि अँधेरों में भी सत्य को पहचान सकें। डॉ दिलीप बच्चानी  पाली मारवाड़, राजस्थान।
उतारन ऐ चड़ावन जी कहानी आहे सीदी सादी जिंदगी बेस्वाद, बेमानी आहे।  कहिंखे घट कहिंखे वधिक मालिक़ डिनो आ मा शुकर भी करा हिय त बेईमानी आहे। 

दायरों के पार, कविता।

दायरों के पार(कविता) कभी ठहर कर सोचा है, वाक़ई में तुम चाहते क्या हो? तुम्हारे पैरों की धड़कन में अभी भी बची है पहाड़ों की पुकार, नदियों का संगीत, और दूर तक फैली पगडंडियों का रहस्य। तुम्हारी सांसों में अब भी कैद है समंदर पार करने का साहस, अनंत आकाश छू लेने की इच्छा, और अजनबी रास्तों पर खुद को खो देने की आज़ादी। पर तुम— खुद को बाँध बैठे हो इन चमकते दायरों में— जहाँ गाड़ियों की गति मन की रफ़्तार नहीं बढ़ाती, जहाँ ऊँची इमारतें सपनों जितनी नहीं, बस अहं जितनी ऊँची होती हैं। जहाँ शराब की बोतलों में मदिरा से ज़्यादा थकान घुली होती है, और रातें नींद से नहीं— भागदौड़ के हिसाब–किताब से कटती हैं। बैंक की किश्तों में बंधा ये कृत्रिम जीवन, एक अदृश्य कारागार है— जहाँ समय भागता है, और तुम खड़े रह जाते हो। डर लगता है, कहीं ऐसा न हो कि सपने इंतज़ार करते रह जाएँ, और तुम गिनते रहो— किस्तें, बिल, तारीखें, जबकि जीवन चुपचाप निकल जाए किसी भूली हुई कैलेंडर की घड़ी से। उठो— अब भी देर नहीं, साल नहीं… सिर्फ़ एक निर्णय चाहिए। क्योंकि जीवन कमाया नहीं जाता, जिया जाता है। डॉ दिलीप बच्चानी  पाली मारवाड़ राजस्थान।