हर तारीफ़ में सच्चाई हो, ज़रूरी तो नहीं, पीठ पीछे लोग क्या-क्या नहीं कहते। सामने आकर तो सब हँसकर मिला करते हैं, दिल की बात मगर खुलकर नहीं कहते। चेहरे पढ़ना भी यहाँ आसान कहाँ होता है, लोग हर राज़ को सच-सच नहीं कहते। जिनसे उम्मीद थी साया भी बनेंगे मेरे, वक़्त आने पे वो अच्छा नहीं कहते। ख़ुद को आईना दिखाना भी गुनाहों सा लगे, लोग अपने ही को सच्चा नहीं कहते। ज़हर लफ़्ज़ों में घोलें तो हुनर मानें उसे, सीधी बातों को यहाँ अच्छा नहीं कहते। ‘दिलीप’ अब तो तजुर्बों ने सिखा दी ये बात, हर मुस्कान को हम सच्चा नहीं कहते।
हमारी बेवकूफ़ियों का अंजाम ये हुआ, खड़े हैं आज फिर हम उसी मुकाम पर। हम अपने ही बनाए दायरों में क़ैद रहे, नज़र गई ही नहीं एक भी आयाम पर। जो सच था सामने, उससे नज़र चुरा बैठे, गुमाँ किए रहे बस अपने ही इल्हाम पर। हर एक बार वही दास्ताँ दोहराई है, ठहर गए हैं क़दम फिर उसी मुकाम पर। सफ़र में साथ जो था, आइना ही था अपना, मगर यक़ीं न किया हमने उसके पैगाम पर। उठे थे हाथ बदलने को अपनी तक़दीरें, मगर झुके ही रहे वक़्त के निज़ाम पर।