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चश्मा(लघुकथा)

लघुकथा ड्राइवर ने डैशबोर्ड पर लगी ईश्वरीय प्रतिमा को नमन कर, स्टीयरिंग को हाथ से छूकर माथे से लगाया और कार स्टार्ट की। पीछे की सीट पर बैठे साहब खिड़की के बाहर देखते हुए बोले, “इस सरकार ने तो प्रदेश का भट्टा बैठा कर रख दिया है। जहाँ देखो, अव्यवस्था ही अव्यवस्था। न तो सड़क ही ठीक है और न ही सफाई। इस बार इस सरकार का जाना तय समझो।” “ऐसी बात नहीं है, साहब! हर गाँव में सरकारी अस्पताल है, स्कूल है, इंटरनेट कनेक्टिविटी है। बुजुर्गों और विधवा महिलाओं को पेंशन प्रदान की जाती है।” “ये सब तो करना ही पड़ेगा। और ये कौन-सा अपनी जेब के पैसे से करते हैं? सब पब्लिक के टैक्स का पैसा है।” “लीजिए, साहब! बातों-बातों में हम स्टेट बॉर्डर क्रॉस करके दूसरे प्रदेश में आ गए।” “पर सड़कों का हाल तो यहाँ भी कुछ ठीक नहीं है। रोड लाइट भी बंद पड़ी है और जगह-जगह ये कचरे के ढेर।” “अरे! सारे काम कोई सरकार तो कर नहीं सकती। आखिर नागरिकों की भी कोई जिम्मेदारी होती है।” साहब ने चश्मा ऊपर करते हुए कहा।
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इक खेल चल रहा है(कविता)

मिलते.....बिछड़ते है हँसते....... रोते है।  मन क्यो मचल रहा है, इक खेल.....चल रहा है।  आते है..... जाते है खोते है.....पाते है। तुझे क्यो .....खल रहा है इक खेल.....चल रहा है।  जीतते है.....हारते है गिरते है......उठते है।  पल पल....पाला बदल रहा है इक खेल.....चल रहा है।  चलता है..... रुकता है थमता है......ठहरता है समय है.....बदल रहा है इक खेल......चल रहा है।  खेल चलेगा.....तब तक जब तक......ये धड़क रहा है।  तू क्यो......मचल रहा है इक खेल....चल रहा है। 

पत्रकारिता-"उद्भव पराभव"।

पत्रकार के सफर का प्रारंभ फील्ड में भाग दौड़ करके काम की खबर निकाल कर लाना होता है।  उसके लिए धक्के खाने पड़ते है, तिकड़में लगानी पड़ती है, और उसके बाद भी खबर संपादक को पसंद आ जायेगी इस बात की कोई गारंटी नहीं होती।  फिर धीरे धीरे वो पत्रकार वरिष्ठ होता जाता है, अब उसे खबरों के लिए धक्के नही खाने पड़ते,खबरे खुद चल कर उसके पास आती है। और उसकी खबरों को अब नकारा भी नही जाता बल्कि फ्रंट पेज की शोभा बनाया जाता है।  उसके बाद एक वक्त आता है जब वो पत्रकार संपादक बन जाता है।  अब तो न वो खबर के पीछे भागता है, न खबर उसके पीछे भागती है।  अब वो नैरेटिव के पीछे भागता है, बड़े-बड़े संपादकीय आलेख लिखता है, लिखता क्या है अपनी सोच अपना नैरेटिव दुसरो पर थोपने की कोशिश करता है।  अब बात करते है दृश्य मीडिया की। कमोबेश यहा भी स्थिति वोही है।  पहले फील्ड में भगदौड़ फिर,टी वी पर एंकरिंग,फिर वरिष्ठ हो जाने पर अपना खुद का एक घँटे का टीवी शो।  जहा खबरे नही उस पत्रकार की विचारधारा परोसी जाती है,पॉजिटिव या नेगेटिव नैरेटिव क्रिएट किया जाता है।  किसी भी एक घटना को लेकर कई-कई दिनों ...
गुलो के पास बैठो,खुशबुओं से सीख कर जाना, असर अहसास का होता है, मौजूदगी का नही। 
मुसीबत में तुम्हें कोई याद करे,तुम कामयाब हो।  कोई तुम पर जब विश्वास कर,तुम कामयाब हो।  अपने लिए तो रोज ही मांगते है लोग मगर, तुम्हारे लिए कोई फरियाद करे,तुम कामयाब हो। 

शेर

कौन कैसा है किधर से मालूम होता है कैसा है बशर नजर से मालूम होता है