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पत्रकारिता-"उद्भव पराभव"।

पत्रकार के सफर का प्रारंभ फील्ड में भाग दौड़ करके काम की खबर निकाल कर लाना होता है।  उसके लिए धक्के खाने पड़ते है, तिकड़में लगानी पड़ती है, और उसके बाद भी खबर संपादक को पसंद आ जायेगी इस बात की कोई गारंटी नहीं होती।  फिर धीरे धीरे वो पत्रकार वरिष्ठ होता जाता है, अब उसे खबरों के लिए धक्के नही खाने पड़ते,खबरे खुद चल कर उसके पास आती है। और उसकी खबरों को अब नकारा भी नही जाता बल्कि फ्रंट पेज की शोभा बनाया जाता है।  उसके बाद एक वक्त आता है जब वो पत्रकार संपादक बन जाता है।  अब तो न वो खबर के पीछे भागता है, न खबर उसके पीछे भागती है।  अब वो नैरेटिव के पीछे भागता है, बड़े-बड़े संपादकीय आलेख लिखता है, लिखता क्या है अपनी सोच अपना नैरेटिव दुसरो पर थोपने की कोशिश करता है।  अब बात करते है दृश्य मीडिया की। कमोबेश यहा भी स्थिति वोही है।  पहले फील्ड में भगदौड़ फिर,टी वी पर एंकरिंग,फिर वरिष्ठ हो जाने पर अपना खुद का एक घँटे का टीवी शो।  जहा खबरे नही उस पत्रकार की विचारधारा परोसी जाती है,पॉजिटिव या नेगेटिव नैरेटिव क्रिएट किया जाता है।  किसी भी एक घटना को लेकर कई-कई दिनों ...
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गुलो के पास बैठो,खुशबुओं से सीख कर जाना, असर अहसास का होता है, मौजूदगी का नही। 
मुसीबत में तुम्हें कोई याद करे,तुम कामयाब हो।  कोई तुम पर जब विश्वास कर,तुम कामयाब हो।  अपने लिए तो रोज ही मांगते है लोग मगर, तुम्हारे लिए कोई फरियाद करे,तुम कामयाब हो। 

शेर

कौन कैसा है किधर से मालूम होता है कैसा है बशर नजर से मालूम होता है
अब गरीबी का आलम ये हुआ प्लास्टर उखड़ने लगे हैं दीवारों से। 

गजल

ये बता, ख़ुद से ये मसख़री क्यों है, तेरे अंदर ये कमतरी क्यों है। था कभी एक आँगन अपना भी, अब ये दीवार तेरी-मेरी क्यों है। एक ही छत थी, एक ही चूल्हा, घर में फिर आज बेदिली क्यों है। कल तलक साथ थे सभी अपने, आज रिश्तों में अनबनी क्यो है। वक़्त बदला तो लोग भी बदले, हर तरफ़ इतनी बेरुख़ी क्यों है। दिल के दरवाज़े बंद हैं कब से, फिर भी आँखों में नमी क्यों है।

रविवार(कविता)

कल सुबह देर तक सोएँगे, नींद को भी आज़ादी देंगे, घड़ी की सुइयों से कुछ पल अपना रिश्ता तोड़ेंगे। कल फ़िल्म देखने जाएँगे, हँसी के दो पल चुरा लाएँगे, पूरा दिन यूँ ही, बेफ़िक्री के नाम लिख जाएँगे। रविवार है, छुट्टी का लुत्फ़ लेना तो बनता है, ज़िंदगी को ज़रा अपने ढंग से जी लेना तो बनता है। इन ख्वाबों के बीच एक खामोश सवाल खड़ा है। काश! मज़दूर के हाथों को भी मिलती कभी ठहराव की राहत, किसान की थकी आँखों में भी उगता एक सुकून भरा रविवार, दुकानदार के बंद शटर पर भी लिखा होता—"आज छुट्टी है", और उसके घर में भी हँसी का एक दिन उतरता। रविवार सिर्फ कैलेंडर का नहीं, हर इंसान के हिस्से का होना चाहिए।