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गजल

ये बता, ख़ुद से ये मसख़री क्यों है, तेरे अंदर ये कमतरी क्यों है। था कभी एक आँगन अपना भी, अब ये दीवार तेरी-मेरी क्यों है। एक ही छत थी, एक ही चूल्हा, घर में फिर आज बेदिली क्यों है। कल तलक साथ थे सभी अपने, आज रिश्तों में अनबनी क्यो है। वक़्त बदला तो लोग भी बदले, हर तरफ़ इतनी बेरुख़ी क्यों है। दिल के दरवाज़े बंद हैं कब से, फिर भी आँखों में नमी क्यों है।
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रविवार(कविता)

कल सुबह देर तक सोएँगे, नींद को भी आज़ादी देंगे, घड़ी की सुइयों से कुछ पल अपना रिश्ता तोड़ेंगे। कल फ़िल्म देखने जाएँगे, हँसी के दो पल चुरा लाएँगे, पूरा दिन यूँ ही, बेफ़िक्री के नाम लिख जाएँगे। रविवार है, छुट्टी का लुत्फ़ लेना तो बनता है, ज़िंदगी को ज़रा अपने ढंग से जी लेना तो बनता है। इन ख्वाबों के बीच एक खामोश सवाल खड़ा है। काश! मज़दूर के हाथों को भी मिलती कभी ठहराव की राहत, किसान की थकी आँखों में भी उगता एक सुकून भरा रविवार, दुकानदार के बंद शटर पर भी लिखा होता—"आज छुट्टी है", और उसके घर में भी हँसी का एक दिन उतरता। रविवार सिर्फ कैलेंडर का नहीं, हर इंसान के हिस्से का होना चाहिए। 

नज्म

नज़्म: किसी के पास बैठो तो अदब से बैठो, ये पास होना सिर्फ़ जगह भरना नहीं होता, ये किसी के दिल में अपनी जगह बनाना होता है। नज़दीकियाँ अक्सर इंसान को हल्का कर देती हैं, लहज़ा बदल जाता है, अंदाज़ ढल जाता है— पर तुम अपनी तहज़ीब को थामे रखना। जब दूर हो जाओ और फासले बातों से ज़्यादा लंबे हो जाएँ, तब भी अपने शब्दों को गिरने मत देना, अपनी यादों को रूखा मत होने देना। क्योंकि अदब— सिर्फ़ पास होने की ज़रूरत नहीं, ये दूरियों में भी जिंदा रहना चाहता है। इसलिए— जब पास बैठो तो अदब से बैठो, और जब दूर हो जाओ तब भी बेअदब मत होना।

गजल

हर तारीफ़ में सच्चाई हो, ज़रूरी तो नहीं, पीठ पीछे लोग क्या-क्या नहीं कहते। सामने आकर तो सब हँसकर मिला करते हैं, दिल की बात मगर खुलकर नहीं कहते। चेहरे पढ़ना भी यहाँ आसान कहाँ होता है, लोग हर राज़ को सच-सच नहीं कहते। जिनसे उम्मीद थी साया भी बनेंगे मेरे, वक़्त आने पे वो अच्छा नहीं कहते। ख़ुद को आईना दिखाना भी गुनाहों सा लगे, लोग अपने ही को सच्चा नहीं कहते। ज़हर लफ़्ज़ों में घोलें तो हुनर मानें उसे, सीधी बातों को यहाँ अच्छा नहीं कहते। ‘दिलीप’ अब तो तजुर्बों ने सिखा दी ये बात, हर मुस्कान को हम सच्चा नहीं कहते। 

गजल।

हमारी बेवकूफ़ियों का अंजाम ये हुआ, खड़े हैं आज फिर हम उसी मुकाम पर। हम अपने ही बनाए दायरों में क़ैद रहे, नज़र गई ही नहीं एक भी आयाम पर। जो सच था सामने, उससे नज़र चुरा बैठे, गुमाँ किए रहे बस अपने ही इल्हाम पर। हर एक बार वही दास्ताँ दोहराई है, ठहर गए हैं क़दम फिर उसी मुकाम पर। सफ़र में साथ जो था, आइना ही था अपना, मगर यक़ीं न किया हमने उसके पैगाम पर। उठे थे हाथ बदलने को अपनी तक़दीरें, मगर झुके ही रहे वक़्त के निज़ाम पर।

गजल।( डाटा)

खत्म डाटा नही खत्म हम हो रहे है।  कुछ मिल भी रहा है या सिर्फ खो रहे है।  खत्म डाटा नही खत्म हम हो रहे है।  रिश्ते जल रहे है  हम सो रहे है।  खत्म डाटा नही खत्म हम हो रहे है।  सोचा है क्या उगेगा जो आज बो रहे है।  खत्म डाटा नही खत्म हम हो रहे है।  बेवजह का भार है जिसे ढो रहे है।  खत्म डाटा नही खत्म हम हो रहे है।