Skip to main content

प्रेम


प्रेम : एक दर्शन

प्रेम कोई दृश्य नहीं
जिसे दिखाया जाए,
वह तो दृष्टि है—
जो देखने का सलीक़ा बदल दे।

प्रेम शब्द नहीं
जो बार-बार दोहराए जाएँ,
वह मौन है—
जो भीड़ में भी अर्थ रच दे।

जहाँ अधिकार समाप्त होते हैं,
वहीं प्रेम जन्म लेता है,
क्योंकि
माँग में नहीं,
स्वीकार में उसका वास है।

प्रेम प्रमाण नहीं चाहता,
न साक्षी, न घोषणा,
वह तो
अहंकार के विसर्जन के बाद
जो शेष बचता है—वही है।

जो हर क्षण स्वयं को सिद्ध करे,
वह आकर्षण हो सकता है,
पर प्रेम नहीं—
प्रेम तो
खुद को भूल जाने का साहस है।

इसलिए
प्रेम प्रदर्शन नहीं,
प्रेम दर्शन है—
देखने का,
जीने का,
और
चुपचाप हो जाने का तरीका।


Comments

Popular posts from this blog

नज्म

नज़्म: किसी के पास बैठो तो अदब से बैठो, ये पास होना सिर्फ़ जगह भरना नहीं होता, ये किसी के दिल में अपनी जगह बनाना होता है। नज़दीकियाँ अक्सर इंसान को हल्का कर देती हैं, लहज़ा बदल जाता है, अंदाज़ ढल जाता है— पर तुम अपनी तहज़ीब को थामे रखना। जब दूर हो जाओ और फासले बातों से ज़्यादा लंबे हो जाएँ, तब भी अपने शब्दों को गिरने मत देना, अपनी यादों को रूखा मत होने देना। क्योंकि अदब— सिर्फ़ पास होने की ज़रूरत नहीं, ये दूरियों में भी जिंदा रहना चाहता है। इसलिए— जब पास बैठो तो अदब से बैठो, और जब दूर हो जाओ तब भी बेअदब मत होना।
अब गरीबी का आलम ये हुआ प्लास्टर उखड़ने लगे हैं दीवारों से। 
उतारन ऐ चड़ावन जी कहानी आहे सीदी सादी जिंदगी बेस्वाद, बेमानी आहे।  कहिंखे घट कहिंखे वधिक मालिक़ डिनो आ मा शुकर भी करा हिय त बेईमानी आहे।