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Showing posts from August, 2026

चश्मा(लघुकथा)

लघुकथा ड्राइवर ने डैशबोर्ड पर लगी ईश्वरीय प्रतिमा को नमन कर, स्टीयरिंग को हाथ से छूकर माथे से लगाया और कार स्टार्ट की। पीछे की सीट पर बैठे साहब खिड़की के बाहर देखते हुए बोले, “इस सरकार ने तो प्रदेश का भट्टा बैठा कर रख दिया है। जहाँ देखो, अव्यवस्था ही अव्यवस्था। न तो सड़क ही ठीक है और न ही सफाई। इस बार इस सरकार का जाना तय समझो।” “ऐसी बात नहीं है, साहब! हर गाँव में सरकारी अस्पताल है, स्कूल है, इंटरनेट कनेक्टिविटी है। बुजुर्गों और विधवा महिलाओं को पेंशन प्रदान की जाती है।” “ये सब तो करना ही पड़ेगा। और ये कौन-सा अपनी जेब के पैसे से करते हैं? सब पब्लिक के टैक्स का पैसा है।” “लीजिए, साहब! बातों-बातों में हम स्टेट बॉर्डर क्रॉस करके दूसरे प्रदेश में आ गए।” “पर सड़कों का हाल तो यहाँ भी कुछ ठीक नहीं है। रोड लाइट भी बंद पड़ी है और जगह-जगह ये कचरे के ढेर।” “अरे! सारे काम कोई सरकार तो कर नहीं सकती। आखिर नागरिकों की भी कोई जिम्मेदारी होती है।” साहब ने चश्मा ऊपर करते हुए कहा।

इक खेल चल रहा है(कविता)

मिलते.....बिछड़ते है हँसते....... रोते है।  मन क्यो मचल रहा है, इक खेल.....चल रहा है।  आते है..... जाते है खोते है.....पाते है। तुझे क्यो .....खल रहा है इक खेल.....चल रहा है।  जीतते है.....हारते है गिरते है......उठते है।  पल पल....पाला बदल रहा है इक खेल.....चल रहा है।  चलता है..... रुकता है थमता है......ठहरता है समय है.....बदल रहा है इक खेल......चल रहा है।  खेल चलेगा.....तब तक जब तक......ये धड़क रहा है।  तू क्यो......मचल रहा है इक खेल....चल रहा है।