बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं।
शब्दों के जन्म से पहले
जो मौन बोल उठता है,
विचारों की पहली धड़कन में
जिसका स्पर्श टहलता है
वही तुम हो, माँ सरस्वती।
श्वेत नहीं, तुम
पूर्वाग्रहों से मुक्त चेतना हो,
जहाँ ज्ञान
अहंकार नहीं
विनय ओढ़कर आता है।
वीणा के हर तार में
अनुशासन नहीं,
संतुलन का संगीत है
कि शिक्षा
हृदय के बिना
केवल शोर है।
हंस तुम्हारा वाहन नहीं,
तुम्हारी सीख है
सब जान लेना सरल है,
सही चुन पाना
एक साधना।
शोर में नहीं मिलतीं तुम,
भीड़ में नहीं बसतीं,
जहाँ मौन सीखने लगे
वहीं उतर आती हो
माँ सरस्वती।
हमें अक्षर नहीं चाहिए,
दृष्टि दो माँ
कि अँधेरों में भी
सत्य को
पहचान सकें।
डॉ दिलीप बच्चानी
पाली मारवाड़, राजस्थान।
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