Skip to main content

गजल।( डाटा)

खत्म डाटा नही
खत्म हम हो रहे है। 

कुछ मिल भी रहा है
या सिर्फ खो रहे है। 

खत्म डाटा नही
खत्म हम हो रहे है। 

रिश्ते जल रहे है 
हम सो रहे है। 

खत्म डाटा नही
खत्म हम हो रहे है। 

सोचा है क्या उगेगा
जो आज बो रहे है। 

खत्म डाटा नही
खत्म हम हो रहे है। 

बेवजह का भार है
जिसे ढो रहे है। 

खत्म डाटा नही
खत्म हम हो रहे है। 

Comments

Popular posts from this blog

अब गरीबी का आलम ये हुआ प्लास्टर उखड़ने लगे हैं दीवारों से। 

नज्म

नज़्म: किसी के पास बैठो तो अदब से बैठो, ये पास होना सिर्फ़ जगह भरना नहीं होता, ये किसी के दिल में अपनी जगह बनाना होता है। नज़दीकियाँ अक्सर इंसान को हल्का कर देती हैं, लहज़ा बदल जाता है, अंदाज़ ढल जाता है— पर तुम अपनी तहज़ीब को थामे रखना। जब दूर हो जाओ और फासले बातों से ज़्यादा लंबे हो जाएँ, तब भी अपने शब्दों को गिरने मत देना, अपनी यादों को रूखा मत होने देना। क्योंकि अदब— सिर्फ़ पास होने की ज़रूरत नहीं, ये दूरियों में भी जिंदा रहना चाहता है। इसलिए— जब पास बैठो तो अदब से बैठो, और जब दूर हो जाओ तब भी बेअदब मत होना।
उतारन ऐ चड़ावन जी कहानी आहे सीदी सादी जिंदगी बेस्वाद, बेमानी आहे।  कहिंखे घट कहिंखे वधिक मालिक़ डिनो आ मा शुकर भी करा हिय त बेईमानी आहे।