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लेख।

हम कर सकते हैं, पर करते नहीं हैं

जब हम घर से बाहर निकलते हैं, तो क्या अपने साथ पानी नहीं ले जा सकते?
क्या बिना प्लास्टिक में बंद कुरकुरे और वेफर्स के हमारा दिन नहीं गुजर सकता?
शादी-ब्याह या पार्टियों में क्या प्लास्टिक के गिलास और बोतलों की जगह कुल्हड़ या धातु के बर्तन इस्तेमाल नहीं किए जा सकते?
निश्चित रूप से यह सब संभव है, परंतु सच्चाई यह है कि हम कर सकते हैं, पर करते नहीं हैं।

आज प्लास्टिक हमारी जरूरत नहीं, आदत बन चुकी है।
यह हर जगह है—खाने की पैकिंग से लेकर पानी की बोतलों तक।
सबसे भयावह बात यह है कि यही प्लास्टिक धीरे-धीरे टूटकर माइक्रोप्लास्टिक बन जाता है, जो हमारी मिट्टी, पानी, हवा और यहाँ तक कि शरीर के भीतर तक पहुँच चुका है।
विज्ञानियों ने पाया है कि हम प्रतिदिन अनजाने में लगभग एक क्रेडिट कार्ड जितना प्लास्टिक निगल लेते हैं।
यह न केवल हमारे पाचन तंत्र, हृदय और हार्मोन तंत्र को प्रभावित करता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य पर भी गहरा असर डाल सकता है।

हर साल लाखों टन प्लास्टिक कचरा नदियों और समुद्रों में बह जाता है।
मछलियाँ, पक्षी और अन्य जीव इन्हें भोजन समझकर निगल लेते हैं, जिससे पूरी खाद्य श्रृंखला दूषित हो रही है।
यह संकट केवल पर्यावरण का नहीं, मानव अस्तित्व का प्रश्न बन गया है।

समाधान कठिन नहीं है —
अगर हम अपनी छोटी-छोटी आदतें बदलें, जैसे स्टील या तांबे की बोतल का उपयोग करें, ढीले नाश्ते और स्थानीय उत्पादों को अपनाएँ, तथा आयोजनों में मिट्टी या धातु के बर्तनों का प्रयोग करें, तो बड़ा परिवर्तन संभव है।

धरती हमारी जिम्मेदारी है, सुविधा का साधन नहीं।
अगर आज हमने चेतना नहीं दिखाई, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें माफ नहीं करेंगी।
हम कर सकते हैं — बस करना शुरू करना होगा।

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नज्म

नज़्म: किसी के पास बैठो तो अदब से बैठो, ये पास होना सिर्फ़ जगह भरना नहीं होता, ये किसी के दिल में अपनी जगह बनाना होता है। नज़दीकियाँ अक्सर इंसान को हल्का कर देती हैं, लहज़ा बदल जाता है, अंदाज़ ढल जाता है— पर तुम अपनी तहज़ीब को थामे रखना। जब दूर हो जाओ और फासले बातों से ज़्यादा लंबे हो जाएँ, तब भी अपने शब्दों को गिरने मत देना, अपनी यादों को रूखा मत होने देना। क्योंकि अदब— सिर्फ़ पास होने की ज़रूरत नहीं, ये दूरियों में भी जिंदा रहना चाहता है। इसलिए— जब पास बैठो तो अदब से बैठो, और जब दूर हो जाओ तब भी बेअदब मत होना।
अब गरीबी का आलम ये हुआ प्लास्टर उखड़ने लगे हैं दीवारों से। 
उतारन ऐ चड़ावन जी कहानी आहे सीदी सादी जिंदगी बेस्वाद, बेमानी आहे।  कहिंखे घट कहिंखे वधिक मालिक़ डिनो आ मा शुकर भी करा हिय त बेईमानी आहे।