प्रेम : एक दर्शन प्रेम कोई दृश्य नहीं जिसे दिखाया जाए, वह तो दृष्टि है— जो देखने का सलीक़ा बदल दे। प्रेम शब्द नहीं जो बार-बार दोहराए जाएँ, वह मौन है— जो भीड़ में भी अर्थ रच दे। जहाँ अधिकार समाप्त होते हैं, वहीं प्रेम जन्म लेता है, क्योंकि माँग में नहीं, स्वीकार में उसका वास है। प्रेम प्रमाण नहीं चाहता, न साक्षी, न घोषणा, वह तो अहंकार के विसर्जन के बाद जो शेष बचता है—वही है। जो हर क्षण स्वयं को सिद्ध करे, वह आकर्षण हो सकता है, पर प्रेम नहीं— प्रेम तो खुद को भूल जाने का साहस है। इसलिए प्रेम प्रदर्शन नहीं, प्रेम दर्शन है— देखने का, जीने का, और चुपचाप हो जाने का तरीका।