दायरों के पार(कविता) कभी ठहर कर सोचा है, वाक़ई में तुम चाहते क्या हो? तुम्हारे पैरों की धड़कन में अभी भी बची है पहाड़ों की पुकार, नदियों का संगीत, और दूर तक फैली पगडंडियों का रहस्य। तुम्हारी सांसों में अब भी कैद है समंदर पार करने का साहस, अनंत आकाश छू लेने की इच्छा, और अजनबी रास्तों पर खुद को खो देने की आज़ादी। पर तुम— खुद को बाँध बैठे हो इन चमकते दायरों में— जहाँ गाड़ियों की गति मन की रफ़्तार नहीं बढ़ाती, जहाँ ऊँची इमारतें सपनों जितनी नहीं, बस अहं जितनी ऊँची होती हैं। जहाँ शराब की बोतलों में मदिरा से ज़्यादा थकान घुली होती है, और रातें नींद से नहीं— भागदौड़ के हिसाब–किताब से कटती हैं। बैंक की किश्तों में बंधा ये कृत्रिम जीवन, एक अदृश्य कारागार है— जहाँ समय भागता है, और तुम खड़े रह जाते हो। डर लगता है, कहीं ऐसा न हो कि सपने इंतज़ार करते रह जाएँ, और तुम गिनते रहो— किस्तें, बिल, तारीखें, जबकि जीवन चुपचाप निकल जाए किसी भूली हुई कैलेंडर की घड़ी से। उठो— अब भी देर नहीं, साल नहीं… सिर्फ़ एक निर्णय चाहिए। क्योंकि जीवन कमाया नहीं जाता, जिया जाता है। डॉ दिलीप बच्चानी पाली मारवाड़ राजस्थान।