Skip to main content

Posts

जिन हाथों ने छुई थी मिट्टी वो हाथ बहुत दुखते है।  ये कंधे नही है अब  भार सहने लायक ये कंधे भी बहुत दुखते हैं। 

गजल

हड्डी पर मांस पर श्वास पर घमंड है मूर्खो को जाने किस बात पर घमंड है।  ये सही है और वो सरासर गलत है जाने कैसे कैसे ख्यालात पर घमंड है।  जाने कब बदल जाए कोई जानता नही कइयों को मौजूदा हालात पर घमंड है।  किसी को अहंकार है रंग रूप पर तो किसी को अपने धर्म जात पर घमंड है।  कोई इतराता है कागज के टुकड़ों पर किसी को अपने ताल्लुकात पर घमंड है।  अगर अंदर झांकोगे तो कोरी मिट्टी है  इन्हें अपने मकानों महलात पर घमंड है।  अजीबो गरीब वहम पाले हुए हुए है लोग पता नही इन्हें किस किस बात पर घमंड है। 

शेर

आज के दौर में ये आम चलन है गैरो से ज्यादा अपनो में जलन है।  डॉ दिलीप बच्चानी। 

महादेव(कविता)

विषव्याप्त जगत में विषपान करो।  हे!शंभू भयहीन हुए आततायी त्रिशूल का संधान करो।  हे!शंभू समाधि का सयंम त्यागो समर में संग्राम करो।  हे!शंभू हे!त्रिपुरारी, गंगाधारी कल्याण करो।  हे!शंभू।  हर हर महादेव।

विमर्श - 6

मेरी औरत।  आपने भी अनुभव किया होगा की कई लोग अपनी पत्नी का परिचय देते हुए या फिर उसके संदर्भ में बात करते हुए एक शब्द का प्रयोग करते है। *ये मेरी औरत है* ये शब्द कानो को कुछ सुहाता नही है चुभता है,खटकता है,अखरता है।और जो ध्वनि कानो को न सुहाए वो मस्तिष्क के लिए भी गुणकारी नही हो सकती।  हमारी सनातन परंपरा में पत्नी को भार्या,संगिनी,सहगामिनी,सहधर्मिणी जैसे शब्दों से संबोधित किया जाता है और जो लोग इन शब्दों के मर्म को समझते है वे अच्छी तरह जानते है कि ये शब्द पति पत्नी की समानता के प्रतीक है।  हम तो अपने अराध्य देवादिदेव महादेव को भी अर्धनारीश्वर रूप में पूजते है,नमन करते है।  चलते चलते एक शेर देखिए।  सहभागी हो साथी हकदार नही हो हमसफर हो राह के खरीदार नही हो। 

स्कैच

कागज पेंसिल लेकर क्यो न निकली जाए दिल की भड़ास बनाया जाए एक स्कैच।  बन गया भद्दा सा बेतरतीब स्कैच शायद ये मैं ही हूँ।  या फिर हम सब। 

प्यार भरी प्रताड़ना।

पिछले एक साल से देख रहा हूँ मेरे परिवार के लोग ही नही,आस पड़ोस वाले,रिश्तेदार, परिचित।और तो ओर दूर दराज के सगे संबन्धि भी बड़े अजीब किस्म के लोग है।  मुझे देखते ही बड़ी विचित्र सी भाषा का प्रयोग करते है। *अले ले ले,उलू लू लू* कोई उत्साह में मुझे उठाकर जबरदस्ती हाथों में झूला झुलाने लगता है तो कोई कोई अतिउत्साही मझे हवा में उछलकर लपकने लगता है।  मैं मजबूर न कुछ कह सकता हूँ नाही कुछ कर सकता हूँ।सब कुछ झेलना पड़ता है चुप चाप।  इतने ज्यादा प्यार का दिखावा करने वाले ये मेरे घर वाले मेरी जरा सी सूसू पॉटी तक को बर्दाश्त नहीं कर सकते, मुझे बांध देते है घँटों तक डायपर से।  औऱ जैसे ही किसी हाथ बढ़ता है मेरे गालो को दबाने के लिए तो ऐसे लगता है जैसे नर्स तीखी नुकीली सुई लेकर आ रही हो मेरी तरफ।  हे! ईश्वर मैने सुना है तू सुनता है बच्चों की प्रार्थना।  या तो मुझे जोड़ दे पुनः गर्भनाल से,या मुझे जल्दी से कर दे बड़ा ताकि मै पा सकू इस प्यार वाली प्रताड़ना से मुक्ति।