Skip to main content

रविवार(कविता)


कल सुबह देर तक सोएँगे,
नींद को भी आज़ादी देंगे,
घड़ी की सुइयों से कुछ पल
अपना रिश्ता तोड़ेंगे।

कल फ़िल्म देखने जाएँगे,
हँसी के दो पल चुरा लाएँगे,
पूरा दिन यूँ ही,
बेफ़िक्री के नाम लिख जाएँगे।

रविवार है,
छुट्टी का लुत्फ़ लेना तो बनता है,
ज़िंदगी को ज़रा
अपने ढंग से जी लेना तो बनता है।

इन ख्वाबों के बीच
एक खामोश सवाल खड़ा है।

काश!
मज़दूर के हाथों को भी
मिलती कभी ठहराव की राहत,
किसान की थकी आँखों में भी
उगता एक सुकून भरा रविवार,

दुकानदार के बंद शटर पर भी
लिखा होता—"आज छुट्टी है",
और उसके घर में भी
हँसी का एक दिन उतरता।

रविवार सिर्फ कैलेंडर का नहीं,
हर इंसान के हिस्से का होना चाहिए। 

Comments

Popular posts from this blog

नज्म

नज़्म: किसी के पास बैठो तो अदब से बैठो, ये पास होना सिर्फ़ जगह भरना नहीं होता, ये किसी के दिल में अपनी जगह बनाना होता है। नज़दीकियाँ अक्सर इंसान को हल्का कर देती हैं, लहज़ा बदल जाता है, अंदाज़ ढल जाता है— पर तुम अपनी तहज़ीब को थामे रखना। जब दूर हो जाओ और फासले बातों से ज़्यादा लंबे हो जाएँ, तब भी अपने शब्दों को गिरने मत देना, अपनी यादों को रूखा मत होने देना। क्योंकि अदब— सिर्फ़ पास होने की ज़रूरत नहीं, ये दूरियों में भी जिंदा रहना चाहता है। इसलिए— जब पास बैठो तो अदब से बैठो, और जब दूर हो जाओ तब भी बेअदब मत होना।
अब गरीबी का आलम ये हुआ प्लास्टर उखड़ने लगे हैं दीवारों से। 
उतारन ऐ चड़ावन जी कहानी आहे सीदी सादी जिंदगी बेस्वाद, बेमानी आहे।  कहिंखे घट कहिंखे वधिक मालिक़ डिनो आ मा शुकर भी करा हिय त बेईमानी आहे।