Skip to main content

Posts

लघुकथा

सौरभ बैंक की स्लिप भर ही रहा था की पीछे से किसी ने कहा बाबूजी एक पर्ची हमारी भी भर दो बिना पीछे मुड़े सौरभ ने कह दिया वहा टेबल पर जाकर बाबूजी से भरवा लो तभी पास में खड़े एक बुजुर्...

गजल

तेरे सारे सवालों का तेरे भीतर जवाब है फकत नीचे अंधेरा है ऊपर जलता चराग है क्यों बेज़ार होता है इस दुनिया की बातों से तेरे भीतर शिवाला है गर तेरा दामन बेदाग है यहाँ से कई लोग गु...

मुक्तक

आटे का डब्बा तेल की बोतल औऱ मसलेदानी ने आज पशेमाँ कर दिया मुझको घर की परेशानी ने

मुक्तक

जो सूरज की मानिंद जलना सीख जाएगा वो हर अंधेरे से निकलना सीख जाएगा                    डॉ दिलीप बच्चानी                    पाली मारवाड़ राजस्थान

गीत

मन की बाते कह देते हो तुम भी मेरे जैसे हो बाहर भीतर कोई न अंतर तुम दर्पण के जैसे हो जैसे बहता निश्छल दरिया तुम दरिया से बहते हो जैसे बढ़ता कोई पौधा तुम तरुवर के जैसे हो सागर के भ...