सौरभ बैंक की स्लिप भर ही रहा था की पीछे से किसी ने कहा बाबूजी एक पर्ची हमारी भी भर दो
बिना पीछे मुड़े सौरभ ने कह दिया वहा टेबल पर जाकर बाबूजी से भरवा लो
तभी पास में खड़े एक बुजुर्ग ने उस ग्रामीण से कहा लाओ भाई मैं भर देता हूँ
सौरभ ने तुरंत पहचान लिया ये तो आंनद के पिताजी शर्मा अंकल थे
कुछ दिन बाद फिर बैंक जाना हुआ तो शर्मा अंकल फिर मिले प्रणाम करके हालचाल पूछा बैंक का काम करके निकल गया
आज फिर सेलेरी निकालने बैंक में फिर शर्मा अंकल को देखकर सौरभ से रहा नही गया
क्या बात है अंकल आप लगभग रोज ही बैंक आते है क्या ?
हा बेटा रोज ही आ जाता हूँ यहाँ जो गांव के कम पढ़े लिखे आदिवासी लोग आते है उनकी रसीद भर देता हूँ
घर मे बैठे बैठे टीवी पर सत्संग देखने से तो ये ज्यादा अच्छा लगता है मुझे
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