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शिक्षित गंवार लघुकथा

शिक्षित गंवार (लघुकथा) बस स्टैंड की बैंच पर बैठते हुए अंकित बोला। अरे यार सुनील पता नही कब बस आएगी,कितनी गंदगी है यहाँ और ये मक्खियां बाप रे बाप ! पास में जमीन पर बैठे ग्रामीणो...
न कोई है उम्मीद न कोई है  विश्चास वे बाट रहे है केवल सबको झूठी आस

यमराज के चमचे

स्वाति रात में पानी पीने के लिए उठी तो राजीव को पसीने से लथपथ लैपटॉप पर काम करते हुए पाया। अरे ! राजीव इतनी रात अब क्या काम कर रहे हो। और ये ए सी रूम में भी तुम्हे इतना पसीना क्य...

घर मे जगह (लघुकथा )

मैं तो कितनी बार आपसे कह कह के तक गई की कोने वाले स्टोर रूम में एक पलंग और पँखा लगवा दीजिये। अलका पलँग की चद्दर ठीक करते हुए बोली। माँजी को वहाँ शिफ्ट कर देते है कितनी दिक्कत ह...

गजल फेसबुक

जब से फेसबुक तैयार हो गयी है तब से जिंदगी इश्तेहार हो गईं है लड़के बेचारे लाइक्स को तरसे लड़कियों पर भरमार हो गयी है अब हर रोज लिखते है वॉल पर कलम बेचारी बेकार हो गयी है यहाँ सब ...

टूटते सपने (लघुकथा)

टुटते सपने (लघुकथा) साँवला रंग लंबा ऊँचा कद साधारण नयन नक्श आत्मविश्वास से लबरेज सलोनी ट्रेक सूट पहनकर जब अपने कॉलेज या मोहहले की गली से निकलती तो किसी लड़के की हिम्मत न होत...

कूलर की हवा

आदित्य के बार बार मना करने पर भी साजिद आकर कमरे के कोने में बैठ जाता। उसकी माँ बाहर बरामदे में पोछा लगा रही थी। तभी फोन बजा। क्या आदित्य कॉफ़ी डे आ रहा है क्या नेहा भी साथ  है। ...