मैं तो कितनी बार आपसे कह कह के तक गई की कोने वाले स्टोर रूम में एक पलंग और पँखा लगवा दीजिये। अलका पलँग की चद्दर ठीक करते हुए बोली।
माँजी को वहाँ शिफ्ट कर देते है कितनी दिक्कत होती है जब कोई मेहमान घर आ जाये तो।
और फिर गुड्डू भी तो बड़ा हो रहा उसके लिए भी जगह चाहिए।
अखिलेश ने मोबाइल से फोन लगाया,
हल्लो शिवम इलेक्ट्रॉनिक्स 8×8 के कमरे में ए सी लगवाना है कितने का होगा ,
अच्छा ठीक है मैं दुकान पर आकर मिलता हूँ।
अलका एकदम बोल पड़ी ए सी की क्या जरूरत है और वैसे भी माँजी तो ए सी चलती ही नही है।
ये ए सी माँ के लिए नही तुम्हारे लिए लगवा रहा हूँ।
गुड्डू की शादी के बाद अगर तुम्हें स्टोर रूम में शिफ्ट होना पड़ा तो तुम बिना ए सी के कैसे रहोगी।
अलका की नजरें झुक चुकी थी।
"मृत्यु का मोल" ( व्यंग्य कविता) अंजान मरे — तो चुपचाप साइड से निकल लो, ना आँसू, ना सवाल — बस भीड़ में खुद को बचा लो। पड़ोसी मरे — तो पूछ लो संस्कार का समय, कंधा न सही, कम से कम दिखा दो थोड़ा नमन। जान-पहचान वाला गया — तो फेसबुक पर "ॐ शांति" लिख दो, दिल से नहीं, टाइपिंग स्पीड से दुख नाप लो। कोई अपना गया — तो आँसू भी प्रॉपर्टी के वजन से गिरते हैं, ग़म भी वसीयत के काग़ज़ों में सुकून ढूंढता फिरता है। और जब आप मरें — तो सोचो, कौन रोएगा सच में? कौन होगा जो तुम्हारे बिना रातों को जागेगा? मौत तो सबकी बराबर होती है — पर इस दुनिया में दुख भी रिश्तों के रैंक से बाँटा जाता है। डॉ दिलीप बच्चानी पाली मारवाड़,राजस्थान।
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