मैं तो कितनी बार आपसे कह कह के तक गई की कोने वाले स्टोर रूम में एक पलंग और पँखा लगवा दीजिये। अलका पलँग की चद्दर ठीक करते हुए बोली।
माँजी को वहाँ शिफ्ट कर देते है कितनी दिक्कत होती है जब कोई मेहमान घर आ जाये तो।
और फिर गुड्डू भी तो बड़ा हो रहा उसके लिए भी जगह चाहिए।
अखिलेश ने मोबाइल से फोन लगाया,
हल्लो शिवम इलेक्ट्रॉनिक्स 8×8 के कमरे में ए सी लगवाना है कितने का होगा ,
अच्छा ठीक है मैं दुकान पर आकर मिलता हूँ।
अलका एकदम बोल पड़ी ए सी की क्या जरूरत है और वैसे भी माँजी तो ए सी चलती ही नही है।
ये ए सी माँ के लिए नही तुम्हारे लिए लगवा रहा हूँ।
गुड्डू की शादी के बाद अगर तुम्हें स्टोर रूम में शिफ्ट होना पड़ा तो तुम बिना ए सी के कैसे रहोगी।
अलका की नजरें झुक चुकी थी।
सोशल मीडिया और राष्ट्रीय संप्रभुता नेपाल में सोशल मीडिया बैन को लेकर जारी विरोध केवल एक देश का मामला नहीं है, बल्कि यह पूरे विश्व के लिए चिंता का विषय है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने सूचना के आदान-प्रदान को सरल बनाया है, लेकिन आज यही माध्यम लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को अस्थिर करने का औजार भी बनता जा रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराने वाली बड़ी कंपनियाँ अपने मुनाफ़े के लिए तो हर देश में सक्रिय रहना चाहती हैं, किंतु उस देश के कानून और नियमों का पालन करने से कतराती हैं। यह प्रवृत्ति राष्ट्रीय संप्रभुता के लिए सीधा खतरा है। हाल के वर्षों में श्रीलंका, बांग्लादेश और अब नेपाल में देखा गया है कि किस प्रकार युवाओं के असंतोष को सोशल मीडिया पर उकसाकर बड़े आंदोलनों का रूप दिया गया। सत्ता परिवर्तन तक की कोशिशें इन माध्यमों से संभव हो रही हैं। इसमें केवल बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ ही नहीं, बल्कि विपक्षी दलों और अंतरराष्ट्रीय शक्तियों का भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हाथ रहता है। यह स्थिति बेहद खतरनाक है, क्योंकि अब यह स्पष्ट हो चुका है कि सोशल मीडिया कंपनियाँ किसी भी देश की आंतरिक स्थिरता को प्रभावित क...
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