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हिंदी कविता

वार्तालाप का माध्यम नही है हिंदुस्तान की जान है हिंदी। चहुँओर फैली सुगंध इसकी माँ भारती का मान है हिंदी। परदेस में भी पांव पसार रही मेरा तो अभिमान है हिंदी। देश को एक सूत्...

गजल

कंटीले पौधे खारा पानी बेस्वाद जिंदगी बेकार जवानी चलती साँसे घड़ी की सुइयां रुकता दरिया गंदला पानी उनकी यादे झूठे सपने उनिंदि आँखे सिर्फ पशेमानी उखड़ी साँसे झुकते कंधे ...

शिक्षित गंवार लघुकथा

शिक्षित गंवार (लघुकथा) बस स्टैंड की बैंच पर बैठते हुए अंकित बोला। अरे यार सुनील पता नही कब बस आएगी,कितनी गंदगी है यहाँ और ये मक्खियां बाप रे बाप ! पास में जमीन पर बैठे ग्रामीणो...
न कोई है उम्मीद न कोई है  विश्चास वे बाट रहे है केवल सबको झूठी आस

यमराज के चमचे

स्वाति रात में पानी पीने के लिए उठी तो राजीव को पसीने से लथपथ लैपटॉप पर काम करते हुए पाया। अरे ! राजीव इतनी रात अब क्या काम कर रहे हो। और ये ए सी रूम में भी तुम्हे इतना पसीना क्य...

घर मे जगह (लघुकथा )

मैं तो कितनी बार आपसे कह कह के तक गई की कोने वाले स्टोर रूम में एक पलंग और पँखा लगवा दीजिये। अलका पलँग की चद्दर ठीक करते हुए बोली। माँजी को वहाँ शिफ्ट कर देते है कितनी दिक्कत ह...

गजल फेसबुक

जब से फेसबुक तैयार हो गयी है तब से जिंदगी इश्तेहार हो गईं है लड़के बेचारे लाइक्स को तरसे लड़कियों पर भरमार हो गयी है अब हर रोज लिखते है वॉल पर कलम बेचारी बेकार हो गयी है यहाँ सब ...