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गजल

शोर के भीतर सन्नाटे सुनना सीख रहा हूँ उलझे उलझे धागों को बुनना सीख रहा हूँ।  सांसो तक  पर पहरा बैठाती दुनियादारी खुद की खातिर खुद को चुनना सीख रहा हूँ।  मै आपकी बातो को किस्सा कह दूँ कैसे मैं खुद किस्सा कहना सुनना सीख रहा हूँ।  दौड़ भाग कर सब कुछ करके देख लिया धीरे धीरे अब कुछ रुकना सीख रहा हूँ।  सबंधो का तानाबाना भरम का मायाजाल जांच परख कर मिलना जुलना सीख रहा हूँ। 

जीवन की रफ्तार। (लघुकथा)

आज पंद्रह दिन हो गए अस्पताल के बेड पर।  रोड एक्सीडेंट में दायीं टांग में मल्टीपल फ्रेक्चर थे।  घर वालो ने बहुत कहा हम आ जाये बेंगलुरु, पर मैने ही मना कर दिया।  क्या जरुरत है आप लोगो के आने की मल्टीस्पेशलिटी लक्सरी अस्पताल  है सेवा करने के लिए नर्सिंग स्टाफ है। और फिर मेरा रूम पार्टनर विवेक सुबह शाम आता रहता है।  शाम को सात बजे विवेक मिलने आया।  मै सड़क पर बाहर खिड़की से आती जाती गाड़ियों को देख रहा था।  दरवाजा बंद कर विवेक मेरे पास आकर बैठ गया।  तू क्या बाहर खिड़की से देखता रहता है? दिन भर टीवी मोबाईल चला कर बोर हो जाता हूँ।  जब खिड़की से बाहर देखता हूँ तो दादा जी की याद आती है।  वो भी दिन भर कुर्सी लगाकर बाहर बैठे रहते थे कोई बात करता तो करते वरना आते जाते लोगो को देखते रहते।  आज मै भी उन्हीं की तरह ढूंढ़ रहा हूँ एकांकीपन में जीवन की रफ्तार। 

सुसंगतता(लघुकथा)

हँसी ठहाको के साथ भोजन का आनंद लेता हुआ पूरा वर्मा परिवार डायनिंग टेबल पर बैठा था।  तभी वत्सल ने अपने पिता की ओर मुखातिब होकर कहा! बाबूजी प्रीती की पढ़ाई भी अब बस खत्म होने वाली है और निहारिका की ताईजी ने प्रीति के लिए एक रिश्ता सुझाया है।  हाँ!बाबूजी लड़का बहुत अच्छा और वेल सैटल्ड है निहारिका ने पानी का जग रखते हुए कहा।  आप कहे तो जन्मपत्री मंगवा ले मिलाने के लिए।  देखो बेटा निहारिका की ताईजी ने रिश्ता बताया है तो अच्छा ही होगा।  परन्तु? परन्तु क्या बाबूजी कहिये न आप जो फैसला लेंगे हम वैसा ही करेंगे।  शिवचरण वर्मा गंभीर मुद्रा में बोले। मै चाहता हूँ कि शादी से पहले लड़का और लड़की का कम्पेटिबिल्टी टेस्ट यानी जेनेटिक काउंसलिंग और कम्पलीट ब्लड प्रोफ़ाइल टेस्ट करवाया जाए।  वत्सल को बाबूजी की आँखों मे अपनी बहन विणा का दर्द साफ नजर आ रहा था।                           
ख्वाहिशें खरपतवार सी उगती है दिल के चुभोने को नश्तर बहुत है।  सादगी से जीना सीख लो दोस्तो वरना अस्पतालों में बिस्तर बहुत है।  भीतर से खोखला खंडहर मकान बाहर दिखावटी पलस्तर बहुत है।  असल चेहरा तो दिखना मुश्किल चेहरे पर चढ़े हुए असतर बहुत है। 
झुकी कमर दबी जुबा मजबूरी वाले लोग चमचागिरी चाकरी जी हुजूरी वाले लोग।  टुकड़ो पर जीते झूठन खाते सलाम बजाते इनसे लाख बेहतर है मजदूरी वाले लोग। 

कागज की खातिर।

चोरी जारी मारामारी सब कागज की खातिर खून पसीना जानमारी सब कागज की खातिर।  प्यार प्रेम खो गए सब मे छल का भाव भरा दोस्ती यारी रिश्तेदारी सब कागज की खातिर।  खेत खलिहान ऑफिस दुकान लगे हुए है सारे दुनिया की दौड़ है जारी सब कागज की खातिर।  बाबू को हिस्सा मिल जाये और साहब को मान चपरासी की जिम्मेदारी सब कागज की खातिर।  शपथ लेकर सँविधान की पदासीन जो होते है नेता बनते भृष्टाचारी सब कागज की खातिर।  कारागार कम पड़ रहे कैदी बढ़ते बढ़ते जाये वकीलों की हिस्सेदारी सब कागज की खातिर।  लट्ठ की ताकत रौब मूछ का डर का कारोबार सारे गुंडो की रंगदारी सब कागज की खातिर।  बेबस आँखे तरस रही कोई तो बचाने आये चोरो को दी पहरेदारी सब कागज की खातिर।  कलम बिक रही मंडी में कवि बन गए भांड कलम ने बेची जिम्मेदारी सब कागज की खातिर। 

दोहा

देहरी लांघी जाए न बंधे बंधे से पांव, स्वर्ग सा सुंदर लगे हमको अपना गांव।