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गजल

शोर के भीतर सन्नाटे सुनना सीख रहा हूँ
उलझे उलझे धागों को बुनना सीख रहा हूँ। 

सांसो तक  पर पहरा बैठाती दुनियादारी
खुद की खातिर खुद को चुनना सीख रहा हूँ। 

मै आपकी बातो को किस्सा कह दूँ कैसे
मैं खुद किस्सा कहना सुनना सीख रहा हूँ। 

दौड़ भाग कर सब कुछ करके देख लिया
धीरे धीरे अब कुछ रुकना सीख रहा हूँ। 

सबंधो का तानाबाना भरम का मायाजाल
जांच परख कर मिलना जुलना सीख रहा हूँ। 











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नज्म

नज़्म: किसी के पास बैठो तो अदब से बैठो, ये पास होना सिर्फ़ जगह भरना नहीं होता, ये किसी के दिल में अपनी जगह बनाना होता है। नज़दीकियाँ अक्सर इंसान को हल्का कर देती हैं, लहज़ा बदल जाता है, अंदाज़ ढल जाता है— पर तुम अपनी तहज़ीब को थामे रखना। जब दूर हो जाओ और फासले बातों से ज़्यादा लंबे हो जाएँ, तब भी अपने शब्दों को गिरने मत देना, अपनी यादों को रूखा मत होने देना। क्योंकि अदब— सिर्फ़ पास होने की ज़रूरत नहीं, ये दूरियों में भी जिंदा रहना चाहता है। इसलिए— जब पास बैठो तो अदब से बैठो, और जब दूर हो जाओ तब भी बेअदब मत होना।
उतारन ऐ चड़ावन जी कहानी आहे सीदी सादी जिंदगी बेस्वाद, बेमानी आहे।  कहिंखे घट कहिंखे वधिक मालिक़ डिनो आ मा शुकर भी करा हिय त बेईमानी आहे।