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न सदा ही दिन है रहता न सदा ही रात रहती है मेघो के बरसते ही नदी ये फिर से बहती है

गजल

जो सूरज की मानिंद जलना सीख जाएगा वो हर अंधेरे से निकलना सीख जाएगा।  न कोई हाथ पकड़ो न कोई सहारा दो उसे वो खुद गिरकर संभलना सीख जाएगा।  अभी मासूम है मासूमियत जिंदा रहने दो बड़ा होगा फितरत बदलना सीख जाएगा।  दुनियावी दस्तूर लगते पैरो में जकड़न से तुम सीखे वो भी चलना सीख जाएगा।  यहाँ पर हर शख्स अलग किरदार रखता है वो भी देखना सांचे में ढलना सीख जाएगा।              

गजल

मेरे भीतर कुछ तो जल रहा है कही कोई लावा है जो पिघल रहा है कही सपनो की अर्थियां जल चुकी लेकिन इस राख में कुछ सुलग रहा है कही फिर पीछे देखकर मायूस होना चाहता हूँ कुछ तो है जो आज बदल रहा है कही  आँख मजबूर है रो भी नही पाती है जाने क्या क्या दिल में चल रहा है कही  चलो फिर वीरान बियाबान को लौट चले वीरान शहर भी जंगल में ढल रहा है कही                          दिलीप बच्चानी                          पाली मारवाड़

दूसरा थप्पड़।लघुकथा।

हाथ मे दबी दवाई की एक पर्ची काउंटर पर रखते हुए महिला बोली। भाई साहब ये दवाई दे दीजिए।  दवा की शीशी औऱ बिल खाकी कागज के लिफाफे में डालकर रामरतन गुप्ता जी बोले बहन जी दो सौ पैतीस रुपये हुए।  साड़ी के पल्लू में बंधे खुले नोटो को गिनकर महिला ने बिल चुकाया औऱ जाने को मुड़ी तभी साथ आये करीब आठ नौ साल के बच्चे ने लिफाफा उठाने की कोशिश की, लिफाफा गिर गया दवा की शीशी चकनाचूर हो गई।  महिला का हाथ गुस्से से बच्चे के गाल की तरफ बड़ा।  अरे!अरे! बहन जी क्या कर रही है बच्चा है गलती से लिफाफा छूट गया मै आपको दूसरी शीशी दे देता हूँ।  पर पैसे? कोई बात नही ये शीशी मेरी तरफ से फ्री।  महिला और बच्चे के जाने के बाद दुकान पर काम करने वाला कर्मचारी राजू बोल पड़ा।  ये क्या किया सेठ जी सुबह सुबह दो सौ पैतीस रुपये का घाटा।  रामरतन गुप्ता गहरी सांस लेते हुए बोले,बचपन में एक दवा की शीशी मुझसे भी टूटी थी।  उस औरत ने जैसे ही थप्पड़ मारने के लिए हाथ उठाया मुझे लगा वो थप्पड़ मुझे ही लगने वाला है।  औऱ मै दूसरा थप्पड़ नही खाना चाहता था। 

हिंदी गजल।

चाहे दबा हुआ है लाख परतों तले पर होता हर मन मे वैराग का मोह।  घर की दीवारें कारावास की तरह छोड़ता कहा है अनुराग का मोह।  ऐसे कैसे सौप दू किसी अंजान को किसे दू मै अपने अनुभाग का मोह।  कइयो बार छला गया ठुकराया गया पर पा न सका मै मेरे भाग का मोह।  मेरे चेहरे पर खुशी उसे मंजूर ही नही छिनता लेता हैं हर विभाग का मोह।  धमनियों का रक्त जब तक न रुके चलता रहेगा द्वेष औऱ राग का मोह। 

पर्यावरण संरक्षण।

आकाश के फेफड़ो में धुंआ भरती चिमनिया धरती के आँचल को अनवरत सोखते ट्यूबवेल।  नदियों को जार जार करता बजरी खनन समंदर को मारता केमिकल और प्लास्टिक।  खाद्यान्न में अत्यधिक घुलता हुआ कीटनाशक  फलो में विटामिन से ज्यादा भर गया जहर।  कुँए, तालाब,बावड़ीया,पोखर गुम हो गए अनगिनत पेड़ो,पक्षियों की प्रजातियां विलुप्त।  और बड़ी शान से साल में लगाते है एक पौधा बन जाते है संवेदनशील पर्यावरण सरंक्षक। 

गजल

शोर के भीतर सन्नाटे सुनना सीख रहा हूँ उलझे उलझे धागों को बुनना सीख रहा हूँ।  सांसो तक  पर पहरा बैठाती दुनियादारी खुद की खातिर खुद को चुनना सीख रहा हूँ।  मै आपकी बातो को किस्सा कह दूँ कैसे मैं खुद किस्सा कहना सुनना सीख रहा हूँ।  दौड़ भाग कर सब कुछ करके देख लिया धीरे धीरे अब कुछ रुकना सीख रहा हूँ।  सबंधो का तानाबाना भरम का मायाजाल जांच परख कर मिलना जुलना सीख रहा हूँ।