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बेची है दवा हमने कुछ इस तरह देदे कोई फकीर दुआ जिस तरह।  हमने देखा क्या हुआ किस तरह फेफड़ो की बेची हवा किस तरह।  आंसुओ की तड़प जाया नही होती देखना लौटेगी बद्दुआ किस तरह।  हैरान हूँ! अजब माजरा देख कर बदल देते हैं ये मुद्दा किस तरह।  इस दौर की नजाकत को समझो तुम नही हो हमसे जुदा किस तरह
कोई तो तरकीब निकाली जाए जिंदगी मौत से बचा ली जाए।  पानी के दो घुट तक  न दे सके इस कत्ल की किसे सजा दी जाए।  हुक्मरान तो मुआवजा दे देंगे पर कैसे यह तड़प मिटा दी जाए।  राजस्थान शर्म से पानी पानी हुआ क्यो न बेशर्म सरकार हटा दी जाए। 

मैं कौन हूँ?

क्या मैं एक शरीर हूँ? नही।  शरीर तो मुर्दे के पास भी होता है।  क्या मै एक मस्तिष्क हूँ? या फिर रक्त शिराओ और धमनियों को रक्त पहुचाने वाला ह्रदय! अस्थियो से बना स्केलेटन, या गोरी या काली त्वचा।  या अन्तःस्त्रावी ग्रथियों से  प्रवाहित कोई हार्मोन,जो कभी कभी करता है मुझे उत्तेजित।  नही नही ये सब मैं नही हो सकता।  मैं एक भेद हूँ वो भेद जो जीव और शव में होता है वो भेद जो प्रकाश और तिमिर में होता हैं। 
उतना गठ्ठर बांधिए, जितना सको उठाय क्षमता से ज्यादा होय,भार सहा न जाये। 

कोरोना

जब एक एक सांस उखड़ती सी लगती है जब एक के बाद दूसरी सांस पहाड़ चढ़ने जैसी बदन टूटता मानो मीलो चले हो हम अपने से ज्यादा सताती अपनो की फिक्र हमे नर्म बिस्तर लगता हैं शरशैय्या जैसा  भूख कही खो जाती प्यास भी नही लगती अजब बीमारी है इलाज कुछ नहीं। 

गजल।

घने तिमिर में उजाले की किरण चाहिए जंग को जीतने का प्रबल प्रण चाहिए।  सांस खुलकर फिर से हम सब ले सके बस वही सुकून भरा एक क्षण चाहिए।  ठाकुर को थाली भरी से सरोकार क्या उसे तो प्रेम से भरा एक कण चाहिए।  नाम तो तुम रख सकते हो बड़े से बड़े बड़ा होने को प्रतिभा विलक्षण चाहिए।  यहाँ पसीना बहाना कोई नही चाहता परिणाम तो सभी को तत्क्षण चाहिए।  दिलीप कलम तुम्हारी बस चलती रहे हमे तो अपना इरादा बस द्रण चाहिए। 

वर्ष प्रतिपदा (कविता)

माँ दुर्गा की आराधना से हम मनाते वर्ष प्रतिपदा हे! मेरे अतुल्य भारत तेरी जगत में जय हो सदा।  ऋतु चक्र अनुकूल पंचांग हमारा है सबसे जुदा हे! मेरे वंदनीय भारत तेरी जगत में जय हो सदा।  प्रकृति भी सजती सँवरती निखरती हर एक लता हे! मेरे पूज्यनीय भारत तेरी जगत में जय हो सदा पावन चैत्र माह में त्यौहारों की रही पावन प्रथा हे! मेरे अतुलनीय भारत तेरी जग में जय हो सदा।  गुड़ी पड़वा, चेटीचंड की चहुँ ओर बिखरती छटा हे! मेरे प्यारे भारत तेरी जगत में जय हो सदा।                          डॉ दिलीप बच्चानी                         पाली मारवाड़, राजस्थान।