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बेची है दवा हमने कुछ इस तरह
देदे कोई फकीर दुआ जिस तरह। 

हमने देखा क्या हुआ किस तरह
फेफड़ो की बेची हवा किस तरह। 

आंसुओ की तड़प जाया नही होती
देखना लौटेगी बद्दुआ किस तरह। 

हैरान हूँ! अजब माजरा देख कर
बदल देते हैं ये मुद्दा किस तरह। 

इस दौर की नजाकत को समझो
तुम नही हो हमसे जुदा किस तरह




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नज़्म: किसी के पास बैठो तो अदब से बैठो, ये पास होना सिर्फ़ जगह भरना नहीं होता, ये किसी के दिल में अपनी जगह बनाना होता है। नज़दीकियाँ अक्सर इंसान को हल्का कर देती हैं, लहज़ा बदल जाता है, अंदाज़ ढल जाता है— पर तुम अपनी तहज़ीब को थामे रखना। जब दूर हो जाओ और फासले बातों से ज़्यादा लंबे हो जाएँ, तब भी अपने शब्दों को गिरने मत देना, अपनी यादों को रूखा मत होने देना। क्योंकि अदब— सिर्फ़ पास होने की ज़रूरत नहीं, ये दूरियों में भी जिंदा रहना चाहता है। इसलिए— जब पास बैठो तो अदब से बैठो, और जब दूर हो जाओ तब भी बेअदब मत होना।
उतारन ऐ चड़ावन जी कहानी आहे सीदी सादी जिंदगी बेस्वाद, बेमानी आहे।  कहिंखे घट कहिंखे वधिक मालिक़ डिनो आ मा शुकर भी करा हिय त बेईमानी आहे।