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मानव में ही खो गई मानवता की गंध इसीलिए टूट रहे ये सारे तटबंबद

आत्म शांति। (लघुकथा)

अरे! भाई तुम इतने उदास,परेशान विचलित से क्यो बैठे हो? तुम तो बड़े भाग्यशाली हो जो तुम्हारे अच्छे कर्मों के कारण तुम्हे स्वर्ग में स्थान मिला है और तुम हो कि यहाँ के किसी आंनद का लाभ ही नही लेते।  यहाँ स्वर्ग में शोक,संताप, रोग के लिए कोई स्थान नही है हर ओर बस आंनद ही आनंद है।  हे!देवदूत आपका कथन सर्वथा सत्य है। परंतु क्या करूँ मुझे मेरे बच्चों मेरी पत्नी और परिवार की चिंता सताती रहती है।मेरे बिना वो कैसे रहेंगे? यही सोच सोच कर मन बेचैन हो जाता हैं।  तुम्हारी समस्या का एक समाधान है मेरे पास।  मैं तुम्हें तम्हारे घर का दृश्य यही पर दिखा देता हूँ। वो देखो तुम्हारे घर पर आज बारहवे की पूजा चल रही हैं पंडित जी आत्म शांति का हवन कर रहे है।  हवन कक्ष में पूरा परिवार रिश्तेदार सभी मौजूद थे। एक कोने में सफेद कपड़ो में सारिका अपनी किसी सहेली के साथ बैठी थी।  सारिका क्या सोचा है तूने अब आगे क्या करना है।  अरे ये सब कामकाज निपटे तो कुछ सोचू, दिन भर रोना धोना। परेशान हो गई हूँ।  वैसे इनके लेपटॉप औऱ डायरी से इतना तो पता चल ही गया है कि इंश्योरेंस की रकम अच्छी खासी...
बेची है दवा हमने कुछ इस तरह देदे कोई फकीर दुआ जिस तरह।  हमने देखा क्या हुआ किस तरह फेफड़ो की बेची हवा किस तरह।  आंसुओ की तड़प जाया नही होती देखना लौटेगी बद्दुआ किस तरह।  हैरान हूँ! अजब माजरा देख कर बदल देते हैं ये मुद्दा किस तरह।  इस दौर की नजाकत को समझो तुम नही हो हमसे जुदा किस तरह
कोई तो तरकीब निकाली जाए जिंदगी मौत से बचा ली जाए।  पानी के दो घुट तक  न दे सके इस कत्ल की किसे सजा दी जाए।  हुक्मरान तो मुआवजा दे देंगे पर कैसे यह तड़प मिटा दी जाए।  राजस्थान शर्म से पानी पानी हुआ क्यो न बेशर्म सरकार हटा दी जाए। 

मैं कौन हूँ?

क्या मैं एक शरीर हूँ? नही।  शरीर तो मुर्दे के पास भी होता है।  क्या मै एक मस्तिष्क हूँ? या फिर रक्त शिराओ और धमनियों को रक्त पहुचाने वाला ह्रदय! अस्थियो से बना स्केलेटन, या गोरी या काली त्वचा।  या अन्तःस्त्रावी ग्रथियों से  प्रवाहित कोई हार्मोन,जो कभी कभी करता है मुझे उत्तेजित।  नही नही ये सब मैं नही हो सकता।  मैं एक भेद हूँ वो भेद जो जीव और शव में होता है वो भेद जो प्रकाश और तिमिर में होता हैं। 
उतना गठ्ठर बांधिए, जितना सको उठाय क्षमता से ज्यादा होय,भार सहा न जाये। 

कोरोना

जब एक एक सांस उखड़ती सी लगती है जब एक के बाद दूसरी सांस पहाड़ चढ़ने जैसी बदन टूटता मानो मीलो चले हो हम अपने से ज्यादा सताती अपनो की फिक्र हमे नर्म बिस्तर लगता हैं शरशैय्या जैसा  भूख कही खो जाती प्यास भी नही लगती अजब बीमारी है इलाज कुछ नहीं।