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तिरंगा

कोई इधर कोई उधर मुँह मोड़ता है एक तिरंगा ही है जो हमे जोड़ता है।  जो जिता है और मरता है इसके लिए वो जवान आखिर में इसे ओढ़ता है।  मात्र ध्वज नही ये भावना है भारत की बनके लहू ये हमारी रगों में दौड़ता है।  जब भी लहराता है हवा में इठलाक़े ये ज़मी आसमाँ पे पहचान छोड़ता है। 

पाली(कविता)

सुनहरी सुबह और सुहानी शाम पाली में शहर है पर बसता एक देसी गांव पाली में।  खुशनुमा दिन और सुकून की रात पाली में जो लगती है जुदा कुछ तो है बात पाली में।  गर्मी थोड़ी तल्ख़ है और सर्दी थोड़ी कड़क कम ही सही पर खूबसूरत बरसात पाली में।  देसी घी का चूरमा और दाल बाटी का रंग मिर्चीबड़े से होती दिन की शुरुआत पाली में।  चाय की थड़ियों पर गप्पबाजी की महफ़िले बेफिक्री के साथ मस्तीभरे अंदाज पाली में।  बदलते दौर में शहर भी रूप बदलते रहते है पर कायम रही है और रहेगी मिठास पाली में। 

पर्यावरण दिवस।

सोसायटी गॉर्डन में पर्यावरण दिवस मनाने की तैयारियां पूरी कर ली गई थी। मजदूरों से गड्ढे खुदवा लिए थे,सरकारी नर्सर्री से पौधे भी आ गए थे। भरी गर्मी में अपनी एसी कार से उतरते हुए मिसेज तनेजा सभी महिलाओं की विश करती हल्लो हाय बोलती आगे बढ़ी।  अरे! चंद्रिका जल्दी करवाओ अब किस बात की देरी है मुझे आज और भी कार्यक्रमो में जाना है।  वो क्या है दीदी अभी तक वो अखबार का फोटोग्राफर नही आया और ना ही कोई पत्रकार।  कुछ देर बाद मिसेज तनेजा अपने आगामी कार्यक्रमो के लिए निकल गई।  आओ बहनों हम सब मिलकर पौधे लगाते है और शपथ भी लेंगे इनकी देखभाल और सुरक्षा की।  तभी कोई महिला सदस्य बोली लगता है आज फोटोग्राफर और पत्रकार ज्यादा ही बिजी है अभी तक नही आये।  आते तो तब जब मैने उन्हें बुलाया होता,कहकर चंद्रिका मुस्करा उठी। 

गजल बेटा।

सत्रहवाँ साल लगा है संभलना प्यारे जीवन का संध्याकाल है संभलना प्यारे। पाने को सारा आकाश है गर चाहो तो खोने को बहुत कुछ है संभलना प्यारे।  बचपने की कोमल पगडंडी पीछे रह गई आगे एक कठोर डगर है संभलना प्यारे।  अल्हड़पन, नादानियां,बदमाशियां छोड़ो अब सयंम का समय है संभलना प्यारे।  कुछ दूर तक मैं साथ हूँ और माँ भी साथ पर आगे तुम्हारा सफर है संभलना प्यारे। 

उपयोगिता(लघुकथा)

सेकेंड क्लास स्लीपर के कम्पार्टमेंट में आमने सामने की छह और साइड की दो सीटों को मिलाकर कुलजमा हम आठ लोग सफर कर रहे थे।  कुछ मोबाइल में व्यस्त थे कुछ बातों में कोने वाले सहयात्री ने प्लेटफॉर्म पर अखबार बेच रहे लड़के से एक राष्ट्रीय दैनिक अखबार खरीद लिया। ट्रेन चलते ही वो अखबार खोल कर उसमें मशगूल हो गए। मै बगल वाली सीट पर उन्हें अखबार पढ़ता हुआ देख रहा था तभी उन्होने अखबार का एक पेज निकाल कर मुझे दे दिया।एक एक पेज कर मैने और लगभग सभी यात्रियों ने अखबार पढ़ लिया।  किसी को बिजनेस न्यूज में रुचि थी तो किसी को स्पोर्ट्स की खबरों,किसी ने संपादकीय लेख पढ़ें तो किसी ने लोकल समाचार।  अब वो अखबार इकठ्ठा करके मोड़ कर कोने में दबा दिया गया था।  अभी कुछ ही समय पहले जिस अखबार मे सबकी रुचि थी अब वो रद्दी हो चुका था।  पता नही क्यो जीवन की संध्या वेला में उस रद्दी अखबार से अपनापन सा लग रहा था।  शायद हम दोनों की ही उपयोगिता खत्म हो चुकी थी। 

जिप

जिप मनुष्य का बनाया हुआ  बहुत बड़ा अविष्कार है।  काश! एक जिप मानव शरीर में भी होती मैं रोक पाता मस्तिष्क में बहते अनगिनत विचारों को। या फिर रोक लेता ह्रदय में उठती पीड़ा की  लहरों को।  इसी जिप से मैं रोकता अनगिनत वेदनाओं को जो मजबूर करती हैं मुझे द्रवित होने को।   है! ईश्वर काश मैं लगा सकता ये जिप उन लोगो के शरीर पर जो करते है मासूम बच्चियों का बलात्कार। 

कविता

मैं अच्छा हूँ बहुत अच्छा हूँ बहुत ही ज्यादा अच्छा हूँ।  पर कब तक? जब तक मैं उपयोगी हूँ।