Skip to main content

पर्यावरण दिवस।

सोसायटी गॉर्डन में पर्यावरण दिवस मनाने की तैयारियां पूरी कर ली गई थी। मजदूरों से गड्ढे खुदवा लिए थे,सरकारी नर्सर्री से पौधे भी आ गए थे। भरी गर्मी में अपनी एसी कार से उतरते हुए मिसेज तनेजा सभी महिलाओं की विश करती हल्लो हाय बोलती आगे बढ़ी। 
अरे! चंद्रिका जल्दी करवाओ अब किस बात की देरी है मुझे आज और भी कार्यक्रमो में जाना है। 
वो क्या है दीदी अभी तक वो अखबार का फोटोग्राफर नही आया और ना ही कोई पत्रकार। 
कुछ देर बाद मिसेज तनेजा अपने आगामी कार्यक्रमो के लिए निकल गई। 
आओ बहनों हम सब मिलकर पौधे लगाते है और शपथ भी लेंगे इनकी देखभाल और सुरक्षा की। 
तभी कोई महिला सदस्य बोली लगता है आज फोटोग्राफर और पत्रकार ज्यादा ही बिजी है अभी तक नही आये। 
आते तो तब जब मैने उन्हें बुलाया होता,कहकर चंद्रिका मुस्करा उठी। 

Comments

Popular posts from this blog

आलेख

सोशल मीडिया और राष्ट्रीय संप्रभुता नेपाल में सोशल मीडिया बैन को लेकर जारी विरोध केवल एक देश का मामला नहीं है, बल्कि यह पूरे विश्व के लिए चिंता का विषय है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने सूचना के आदान-प्रदान को सरल बनाया है, लेकिन आज यही माध्यम लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को अस्थिर करने का औजार भी बनता जा रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराने वाली बड़ी कंपनियाँ अपने मुनाफ़े के लिए तो हर देश में सक्रिय रहना चाहती हैं, किंतु उस देश के कानून और नियमों का पालन करने से कतराती हैं। यह प्रवृत्ति राष्ट्रीय संप्रभुता के लिए सीधा खतरा है। हाल के वर्षों में श्रीलंका, बांग्लादेश और अब नेपाल में देखा गया है कि किस प्रकार युवाओं के असंतोष को सोशल मीडिया पर उकसाकर बड़े आंदोलनों का रूप दिया गया। सत्ता परिवर्तन तक की कोशिशें इन माध्यमों से संभव हो रही हैं। इसमें केवल बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ ही नहीं, बल्कि विपक्षी दलों और अंतरराष्ट्रीय शक्तियों का भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हाथ रहता है। यह स्थिति बेहद खतरनाक है, क्योंकि अब यह स्पष्ट हो चुका है कि सोशल मीडिया कंपनियाँ किसी भी देश की आंतरिक स्थिरता को प्रभावित क...

नज्म

नज़्म: किसी के पास बैठो तो अदब से बैठो, ये पास होना सिर्फ़ जगह भरना नहीं होता, ये किसी के दिल में अपनी जगह बनाना होता है। नज़दीकियाँ अक्सर इंसान को हल्का कर देती हैं, लहज़ा बदल जाता है, अंदाज़ ढल जाता है— पर तुम अपनी तहज़ीब को थामे रखना। जब दूर हो जाओ और फासले बातों से ज़्यादा लंबे हो जाएँ, तब भी अपने शब्दों को गिरने मत देना, अपनी यादों को रूखा मत होने देना। क्योंकि अदब— सिर्फ़ पास होने की ज़रूरत नहीं, ये दूरियों में भी जिंदा रहना चाहता है। इसलिए— जब पास बैठो तो अदब से बैठो, और जब दूर हो जाओ तब भी बेअदब मत होना।
अब गरीबी का आलम ये हुआ प्लास्टर उखड़ने लगे हैं दीवारों से।