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गजल

#विश्वकवितादिवस गम की खुशी की आँसू की बात लिख ऐ! कलम तू जज्ब लिख जज्बात लिख।  तू न लिखना रंगीनियों के रंगीन किस्से तू मजबूरों की बात लिख हालात लिख।  दिल्लगी के अफसानों से मन न बहला तू मानस को जगाए ऐसे ख्यालात लिख।  जो न बन सके अखबारों की सुर्खियां तू ऐसे दबे छुपे दफ़्न मामलात लिख।  हकीमो की बाते तो चाटुकार लिख लेंगे तू मजलूमों की बात पर कलमात लिख।  डॉ दिलीप बच्चानी  पाली मारवाड़, राजस्थान।

शिव स्तुति

शिव ही आदी अंत है शिव है जीवन सार, शिव ही जीवन मूल है शिव जीवन आधार।  जपले शिवा शिवा।  शिव से ही संगीत है शिव से ही विज्ञान, शिव में है सब योग शिव में ही है ध्यान।  भजले शिवा शिवा।  शिव में सब प्रकाश है हरता जो अंधकार, शिव ही हर आकार है शिव ही है निराकार।  रटले  शिवा शिवा।  शिव ही देवो के देव है शिव ही है विश्वास, दुनिया से क्या चाहता शिव से कर ले आस।  जपले शिवा शिवा। 
क्या करेंगे लंबी उम्र का हम जब तक जिये बस चलते रहे। 

विस्थापन(लघुकथा)

लंच टाइम पर ऑफिस के सभी सहकर्मी एक ही टेबल पर अपने अपने टिफिन लेकर बैठे थे, सामने टीवी पर जोशीमठ से जुड़ी खबरे दिखाई जा रही थी।  कुछ परिवारों को विस्थापित कर दूसरी जगह भेजने की बात चल रही थी तो कुछ मकानों और होटलों को ध्वस्त करने की।  इन खबरों को देख स्वाति कुछ खो सी गई उसकी आँखों मे गीलापन मगसूस किया जा सकता था।  बगल में बैठी सहकर्मी ने स्वाति की ओर देखा।  अरे!स्वाति क्या हुआ तू क्यों उदास हो रही है,तू जोशीमठ में नही गुरुग्राम में है।  स्वाति गला साफ करते हुए बोली,कुछ नही बस बचपन याद आ गया।  हमारा परिवार भी टिहरी गढ़वाल से ऐसे ही विस्थापित किया गया था, अपना सब कुछ पीछे छोड़ कर मुठ्ठीभर सरकारी मदद के सहारे हमे नए शहर में रहने को मजबूर कर दिया गया।  विस्थापन चाहे सामाजिक हो,आर्थिक,हो,राजनीतिक हो या फिर प्राकृतिक होता बहुत ही पीड़ादायक है।  विस्थापन से केवल किसी का एड्रेस नही बदलता बल्कि उसका पूरा सामाजिक तानाबाना और संस्कृति बदल जाती है।  इन जोशीमठ वालो की पीड़ा या मैं महसूस कर सकती हूँ या फिर कौल साहब।स्वाति ने कौल साहब की तरफ इशारा करते हुए कहा इ...
जिन हाथों ने छुई थी मिट्टी वो हाथ बहुत दुखते है।  ये कंधे नही है अब  भार सहने लायक ये कंधे भी बहुत दुखते हैं। 

गजल

हड्डी पर मांस पर श्वास पर घमंड है मूर्खो को जाने किस बात पर घमंड है।  ये सही है और वो सरासर गलत है जाने कैसे कैसे ख्यालात पर घमंड है।  जाने कब बदल जाए कोई जानता नही कइयों को मौजूदा हालात पर घमंड है।  किसी को अहंकार है रंग रूप पर तो किसी को अपने धर्म जात पर घमंड है।  कोई इतराता है कागज के टुकड़ों पर किसी को अपने ताल्लुकात पर घमंड है।  अगर अंदर झांकोगे तो कोरी मिट्टी है  इन्हें अपने मकानों महलात पर घमंड है।  अजीबो गरीब वहम पाले हुए हुए है लोग पता नही इन्हें किस किस बात पर घमंड है। 

शेर

आज के दौर में ये आम चलन है गैरो से ज्यादा अपनो में जलन है।  डॉ दिलीप बच्चानी।