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गजल

कल क्या हो किसी को कोई खबर नहीं कल की फ़िक्र से अलहदा कोई बशर नही।  भटकता फिरता हूँ सुकून की तलाश में लगता है मुझको जैसे मेरा कोई घर नही। चेहरे को ढक को रखता है मुस्कराहटों से ऐसा नहीं है कि उसे कोई फ़िकर नही।  रात की स्याह परछाईया बढ़तीं ही जा रही लगता है इस रात की कोई सहर नही।  पूरे गुलशन में मुझे तितलियां नही दिखी लगता है इस गुलशन में गुलों का शजर नही।  मेरी तमाम खुशियां रहतीं है उस ओर उस ओर जाने को पर कोई डगर नही।  पा लिया इतना जिसका हकदार भी न था अब मौत भी आ जाये तो कोई डर नही।

रावण(कविता)

असफलता का भय तो रावण है ही सफलता का मद भी रावण है।  कुरूपता की ग्लानि तो रावण है ही सुंदरता का अहम भी रावण है।  परस्त्री का मोह तो रावण है ही स्वस्त्री की उपेक्षा भी रावण है।  स्वंय पर क्रोध तो रावण है ही दुष्टों पर दया भी रावण है।  अंधकार की कालिमा तो रावण है ही प्रकाश की चकाचौंध भी रावण है।  सत्य का अस्वीकार तो रावण है ही असत्य का अंगीकार भी रावण है। 

पानी (कविता)

सबसे सर्वश्रेष्ठ पानी वो है जिसे छूने मात्र से समस्त पापो का नाश हो जाता है, जिसे हम गंगाजल कहते है।  सबसे स्वच्छ पानी वो है जो किसी पहाड़ी झरने से कल कल करता हुआ बहता है और हमारी प्यास बुझाता है।  सबसे मीठा पानी वो है जो जेठ वैशाख की गर्मी में प्याऊ पर पथिको को पिला उन्हें विश्राम प्रदान करता है।  सबसे खारा पानी समुद्र का है परंतु वो भी पावन जल है क्योकि वो भी वाष्प बनकर हमे वर्षा प्रदान करता है।  सबसे महंगा पानी वो है जो मरुस्थल में हमारी माताएं बहने बड़ी दूर से अपने मटके मे भर अपने घर पर लाती है।  और सबसे अनमोल पानी वो है जो भक्ति से ओतप्रोत हो हरिचरणो में अश्रु के रूप में आँखों से गिरता है। 

हिंदी दिवस

इंग्लिश वाली गिटपिट छोड़े आओ हम हिंदी में बोले।  दिल से हिंदी को अपनाए आओ हम हिंदी के हो ले।  जनभाषा का सम्मान जिसे है उसकी मिश्री कानो में घोले।  पंथ प्रांत के भेद को भूले मिलकर सब हिंदी में बोले। 

कहानी(कविता)

एक कहानी (कविता) आपकी,मेरी हमसब की कहानी शुरू होती है, बचपने में दादा दादी की मासूमियत भरी कहानियों के साथ।  फिर स्कूल कॉलेज में दोस्तो,यारो,अध्यापकों की अनगिनत कहानियां जुड़ती चली जाती है।  किशोरवय से होते हुए जवानी तक।  और हर जवानी की एक कहानी तो होती ही है।  कहानी के मध्यांतर में हमारे द्वारा किया गया संघर्ष ही हमे पहुचाता है सफलता या विफलता की  पायदान पर।  जीवन के सभी पायदानों की कहानियों को पार करते हुए कहानी पहुँचती है पटाक्षेप की ओर।  जहाँ हम पाते पोतियों को कहानियां सुनाते हुए बन जाते है।  एक कहानी।  शायद हम जन्म ही लेते है एक कहानी बनने के लिए। 

प्रदूषित शहर।

इन बड़े शहरों का प्रदूषित वातावरण,सुबह की सैर भी फायदा देने की बजाय नुकसानदायक लगने लगती है।  सरिता देवी चाय का कप पकड़ाते हुए बोली अब आपको यहां कौसानी जैसी शुद्ध हवा तो मिलने से रही।  नाश्ते की टेबल पर चर्चा के दौरान कौसानी जाने का प्रोग्राम तय हो गया।  बड़े बेटे ने अपने पिता कल्याण सिंह रावत से पूछा। पिताजी नैनीताल में होटल बुक करवा दू क्या।  अरे! नही बेटे अपने पुरखों की पुशतैनी हवेली है वही चल कर रुकेंगे और परिवार के लोगो से मिलना भी हो जाएगा।  पूरा सफर बचपन और किशोरावस्था के सुंदर सपनो में और कौसानी की खूबसूरत वादियों की यादों में निकल गया।  काठगोदाम से कार बुक करके कौसानी पहुँचे, कस्बे में घुसते ही कल्याण सिंह रावत अचंभित रह गए।  जगह जगह होटल, लॉज, रेस्टोरेंट, कैफे खुल गए थे, वो पुरानी नैसर्गिक खूबसूरती खो सी गई थी।  हवेली के सामने गाड़ी रुकी वहा भी हवेली के ज्यादातर हिस्से को लॉज, रेस्टोरेंट आदि में बदला जा चुका था।  बैठक में चाचा,ताऊ संग बैठे चाय पी ही रहे थे कि छोटे चाचा बोले परिवार के साथ घूमने निकले हो? इतने सालों बाद याद आयी अपने गांव ...

रसमुग्धा(लघुकथा)

पारिवारिक आयोजन में सम्मिलित होने के लिए तीनो बेटे चिड़ावा आये हुए थे।दोपहर के भोजन उपरांत सभी लोग इकट्ठा बैठे हुए गपशप में मशगूल थे,तभी सबसे छोटे बेटे ने अपने पिता रिटायर्ड प्रिंसिपल ओमप्रकाश शर्मा जी से पूछा बाबूजी आपकी पत्रिका रसमुग्धा का क्या हाल है कितनी प्रतियां छप रही है आजकल।  अब क्या बताये? आजकल की पीढ़ी को मोबाइल और कम्प्यूटर से फुर्सत मिले तो कोई पुस्तक,पत्रिका पढ़े।  पिछले तीन महीने से प्रकाशन लगभग बंद ही पड़ा हुआ है, अब न तो विज्ञापन मिलते है और न ही पाठक।  बाबूजी आप एक काम क्यो नही करते एक वेब पोर्टल बनाकर रसमुग्धा को ई-पत्रिका के रूप में प्रकाशित करिए,पाठकों तक पहुंच भी बढ़ेगी खर्चा भी कम होगा और हमारी रसमुग्धा पुनर्जीवित भी हो जाएगी।  मैं आपको मेरा लैपटॉप दे जाऊंगा,आप लेखकों की रचनाएं, लेख,कविता,कहानियां ओर अपना संपादकीय लिखकर मुझे भेज दीजिएगा और हर महीने मासिक ई-पत्रिका रसमुग्धा प्रकाशित हो जाएगी।  ओमप्रकाश शर्मा जी ने आज के दौर की परिस्थितियों को स्वीकारते हुए हामी भर दी।  बेटे खुश थे कि इसी बहाने पिता की पेंशन के रुपये पत्रिका में फालतू खर्च न...