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गजल

कल क्या हो किसी को कोई खबर नहीं
कल की फ़िक्र से अलहदा कोई बशर नही। 

भटकता फिरता हूँ सुकून की तलाश में
लगता है मुझको जैसे मेरा कोई घर नही।

चेहरे को ढक को रखता है मुस्कराहटों से
ऐसा नहीं है कि उसे कोई फ़िकर नही। 

रात की स्याह परछाईया बढ़तीं ही जा रही
लगता है इस रात की कोई सहर नही। 

पूरे गुलशन में मुझे तितलियां नही दिखी
लगता है इस गुलशन में गुलों का शजर नही। 

मेरी तमाम खुशियां रहतीं है उस ओर
उस ओर जाने को पर कोई डगर नही। 

पा लिया इतना जिसका हकदार भी न था
अब मौत भी आ जाये तो कोई डर नही।


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