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राम।

राम नाम मय हुआ आज सकल संसार भीगी भीगी पलके,हर्षित ह्रदय आपार।  दीपोत्सव है तैयारी सजे घर और द्वार दुख हरने को आ रहे सबके तारणहार।  मन की वीणा के सभी झनक रहे है तार भारतवर्ष में ले रहा रामराज्य आकार।  राम संदेशा दे रही यह सरयू की धार आज अवध में मगन है सारे नर औ नार। 
छोड़ो गमो का भार यहाँ, खुशी जीवन आधार यहाँ एक सफर ही तो खत्म हुआ है,चलना बहुत है यार यहाँ। 

जंजीरे

जंजीरे वो नही है जो बंधती है आपके हाथ पांव और सीमित कर देती है आपको एक कोने में।  कुछ अदृश्य जंजीरे हम सभी को बांधे हुए है जो दिखती नही है, पर उनकी पकड़  बहुत मजबूत है।  वे जंजीरे है विचारों की जंजीरे।  जो रोकती है आपको किसी दूसरे विचार को सुनने,सोचने और समझने से।  धर्म की जंजीरे जात पात की जंजीरे समाज की जंजीरे परिवेश की जंजीरे प्रांत की जंजीरे भाषा की जंजीरे शिक्षा की जंजीरे।  और सबसे बड़ी जंजीर है इन सांसो की जंजीर जिसने हमे बांध रखा है इस नश्वर शरीर से।  जिस दिन टूट जाएगी ये जंजीर हम आजाद होंगे अंनत व्योम की यात्रा के लिए। 

कविता

कुछ पन्ने जिंदगी के फाड़ दिए जाएं तो बेहतर है।  हर पन्ने से गुलाब की खुशबू नही आती।  नजर बार बार उधर ही जाती है लिखी है जिन पन्नो में अठखेलियाँ तेरी।  जिन्हें पढ़कर हरबार आँखे नम हो हो जाती है न चाहते हुए भी, पढ़ता हूँ बार बार।  कामयाबियां,नाकामियां शिकायतें,शरारते जाने क्या क्या है छुपा इन पन्नो में।  इन पुराने पन्नो को छूना डायरी को सीने पर रख सो जाना, भुला देता है सब तकलीफों को। 

गजल

जो सूरज की तरह से यार जलना सीख जाएगा। अंधेरे चीरना, उनसे निकलना सीख जाएगा। न कोई हाथ पकड़ो ना सहारा दो उसे कोई, खुद ब खुद वो मेरे साथी संभलना सीख जाएगा। अभी मासूम है, मासूमियत जिंदा रहे उसमें, किताबें पढ़ के वो फितरत बदलना सीख जाएगा। सुनो ये दुनिया के दस्तूर, जैसे हथकड़ी कोई,  जिस तरह तुमने सीखा, वो भी चलना सीख जाएगा। यहां हर शख्स का अपना अलग किरदार होता है, समय को देख वो सांचे में ढलना सीख जाएगा‌। न दो तुम ज्ञान, ईश्वर ने सभी कुछ दे के भेजा है, अगर बंदर है तो निश्चित उछलना सीख जाएगा। अभी बच्चा है बचपना रहने तो दो तुम उसमे खिलौने देखकर खुद ही मचलना सीख जाएगा।

दीपावली

उजियारा जीते सदा,तम की होती हार संघर्षों के बाद अब, सजा राम दरबार।  सजा राम दरबार,अवध की छटा निराली सरयू तट मना रहा अब हर दिन दिवाली।