अफसर से ले पंगा
केजरी हो गया है बेरंग
किसके साथ होली खेले
कोई नही अब संग
जोगी रा सा रा रा
जेल में बैठा लालू अंदर
होली खूब मनावे
गाय भैस को देख
आप ही मंद मंद मुस्कावे
जोगी रा से रा रा
मथुरा में योगी जी देखो
कैसा रंग लगावे
अगले चुनाव से पहले
वोटर को खूब रिझावै
जोगी रा सा रा रा रा
नीतीश जी ने लालू से
पल्ला खूब छुड़ाया
औऱ बेटे के बंगले में
प्रेत भूत डलवाया
जोगी रा सा रा रा रा
कैसे होली खेले मैडम जी
भूत हमे सताता है
विधान भवन भी अब
हमको खूब डराता है
जोगी रा सा रा रा रा
नीरव मोदी ने बैंकों को
पूरा ही धो डाला
रोज रोज ही निकल रहा
नित नया घोटाला
जोगी रा सा रा रा रा
"मृत्यु का मोल" ( व्यंग्य कविता) अंजान मरे — तो चुपचाप साइड से निकल लो, ना आँसू, ना सवाल — बस भीड़ में खुद को बचा लो। पड़ोसी मरे — तो पूछ लो संस्कार का समय, कंधा न सही, कम से कम दिखा दो थोड़ा नमन। जान-पहचान वाला गया — तो फेसबुक पर "ॐ शांति" लिख दो, दिल से नहीं, टाइपिंग स्पीड से दुख नाप लो। कोई अपना गया — तो आँसू भी प्रॉपर्टी के वजन से गिरते हैं, ग़म भी वसीयत के काग़ज़ों में सुकून ढूंढता फिरता है। और जब आप मरें — तो सोचो, कौन रोएगा सच में? कौन होगा जो तुम्हारे बिना रातों को जागेगा? मौत तो सबकी बराबर होती है — पर इस दुनिया में दुख भी रिश्तों के रैंक से बाँटा जाता है। डॉ दिलीप बच्चानी पाली मारवाड़,राजस्थान।
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