काले मुस्टंडे सेठ की हंटर सी कड़कती आवाज छोटू ऊपर 20 नम्बर में दो चाय दे के आ औऱ जल्दी आना वरना ये कप प्लेट क्या तेरा बाप धोएगा
नन्हे हाथो में चाय की केतली औऱ गिलास थामे नीम अंधेरी सीढ़ियां चढ़ता हुआ दरवाजे तक पहुँचा अंदर से अजीब सी आवाजें आ रही थी
औऱ जैसे ही पर्दा हटाया चाय की केतली गिर गयी गिलासों के टूटने की आवाज
समर बिस्तर से अचानक उठ बैठा पसीने पसीने दिल धड़क नही रहा हो मानो पसलियों पर चोट कर रहा हो
पास लेटी सरला भी उठ बैठी
आज फिर वो ही सपना
आप भूल क्यो नही जाते अपने कड़वे अतीत को
सरला पत्थर पर लिखा हुआ मिट जाता है
पर मन पर लिखा कभी नही मिटता
डॉ दिलीप बच्चानी
पाली मारवाड़ राजस्थान
9829187615
"मृत्यु का मोल" ( व्यंग्य कविता) अंजान मरे — तो चुपचाप साइड से निकल लो, ना आँसू, ना सवाल — बस भीड़ में खुद को बचा लो। पड़ोसी मरे — तो पूछ लो संस्कार का समय, कंधा न सही, कम से कम दिखा दो थोड़ा नमन। जान-पहचान वाला गया — तो फेसबुक पर "ॐ शांति" लिख दो, दिल से नहीं, टाइपिंग स्पीड से दुख नाप लो। कोई अपना गया — तो आँसू भी प्रॉपर्टी के वजन से गिरते हैं, ग़म भी वसीयत के काग़ज़ों में सुकून ढूंढता फिरता है। और जब आप मरें — तो सोचो, कौन रोएगा सच में? कौन होगा जो तुम्हारे बिना रातों को जागेगा? मौत तो सबकी बराबर होती है — पर इस दुनिया में दुख भी रिश्तों के रैंक से बाँटा जाता है। डॉ दिलीप बच्चानी पाली मारवाड़,राजस्थान।
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