Skip to main content

मनोरंजन की दुकान

मनोरंजन की दुकान  ( लघुकथा  )

जज रामस्वरूप सारस्वत की अदालत आज खचाखच भरी हुई थी।
शहर में हुए चर्चित हाईप्रोफाइल गैंगरेप की सुनवाई जारी थी।
माननीय न्यायाधीश महोदय तीनो अभ्युक्तो के भविष्य को ध्यान में रखते हुए मै अदालत से कम से कम सजा की अपील करता हूं। (डिफेंस लॉयर)
आब्जेक्शन मिलार्ड प्रॉसिक्यूशन द्वारा पेश सबूत गवाह मेडिकल रिपोर्ट इन सब आरोपियों को दोषी करार देने के लिए काफी है।
अतः इन्हें इनके कुकर्म का उचित दंड दिया जाए।
अदालत अपना फैसला जरूर देगी आज ही देगी परन्तु एक बाप जिसने अपनी बेटी को खोया है उसे एक बार जरूर सुनना चाहेगी।
अपने आंसू पोछते हुए तिवारी साहब कटघरे तक पहुचे।
जज साहब इन तीनो हैवानो ने जो दरिंदगी की उसकी सजा तो इन्हें आप दे ही देंगे,
परन्तु मेरी बेटी के हत्यारों को सजा कौन देगा।
आप क्या कहना चाहते है ?
इन तीन पापियों ने तो सिर्फ मेरी बेटी की अस्मत लूटी है असली हत्यारे तो है ये टीवी और अखबार वाले जिन्होंने रात दिन घुमा घुमा कर वो स्टोरी चलाई औऱ उसे इतना मानसिक संताप दिया की उसने अपनी जान दे दी।
ये खबर नही बेचते जनाब चटपटी मजेदार खबरे बेचने वाली,
मनोरंजन की दुकानें है।

                    ©डॉ दिलीप बच्चानी
                     पाली मारवाड़ राजस्थान
                     9829187615

Comments

Popular posts from this blog

मृत्यु का मोल। (कविता)

"मृत्यु का मोल" ( व्यंग्य कविता) अंजान मरे — तो चुपचाप साइड से निकल लो, ना आँसू, ना सवाल — बस भीड़ में खुद को बचा लो। पड़ोसी मरे — तो पूछ लो संस्कार का समय, कंधा न सही, कम से कम दिखा दो थोड़ा नमन। जान-पहचान वाला गया — तो फेसबुक पर "ॐ शांति" लिख दो, दिल से नहीं, टाइपिंग स्पीड से दुख नाप लो। कोई अपना गया — तो आँसू भी प्रॉपर्टी के वजन से गिरते हैं, ग़म भी वसीयत के काग़ज़ों में सुकून ढूंढता फिरता है। और जब आप मरें — तो सोचो, कौन रोएगा सच में? कौन होगा जो तुम्हारे बिना रातों को जागेगा? मौत तो सबकी बराबर होती है — पर इस दुनिया में दुख भी रिश्तों के रैंक से बाँटा जाता है। डॉ दिलीप बच्चानी  पाली मारवाड़,राजस्थान।

आलेख

सोशल मीडिया और राष्ट्रीय संप्रभुता नेपाल में सोशल मीडिया बैन को लेकर जारी विरोध केवल एक देश का मामला नहीं है, बल्कि यह पूरे विश्व के लिए चिंता का विषय है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने सूचना के आदान-प्रदान को सरल बनाया है, लेकिन आज यही माध्यम लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को अस्थिर करने का औजार भी बनता जा रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराने वाली बड़ी कंपनियाँ अपने मुनाफ़े के लिए तो हर देश में सक्रिय रहना चाहती हैं, किंतु उस देश के कानून और नियमों का पालन करने से कतराती हैं। यह प्रवृत्ति राष्ट्रीय संप्रभुता के लिए सीधा खतरा है। हाल के वर्षों में श्रीलंका, बांग्लादेश और अब नेपाल में देखा गया है कि किस प्रकार युवाओं के असंतोष को सोशल मीडिया पर उकसाकर बड़े आंदोलनों का रूप दिया गया। सत्ता परिवर्तन तक की कोशिशें इन माध्यमों से संभव हो रही हैं। इसमें केवल बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ ही नहीं, बल्कि विपक्षी दलों और अंतरराष्ट्रीय शक्तियों का भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हाथ रहता है। यह स्थिति बेहद खतरनाक है, क्योंकि अब यह स्पष्ट हो चुका है कि सोशल मीडिया कंपनियाँ किसी भी देश की आंतरिक स्थिरता को प्रभावित क...

हे!मोबाईल। (कविता)

हे! मोबाईल तुम वाकई एक क्रांति हो।  पलक झपकते ही, पहुंचा देते हो  सूचनाएं सात समंदर पार।  कहा क्या अच्छा-बुरा हुआ सभी तो पता है तुम्हे।  हजारो संदेशो का आदान-प्रदान,वाकई बड़ा करामाती काम है।  पर हे! मोबाईल बुरा न मानो तो एक बात कहु।  तुम अखबार हो, तुममे वो चिठ्ठियों वाली मिठास नही है।