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दोहे

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जितना मालिक ने दिया
उतने में संतोष,
दूजा आगे बढ़ रहा
इसमें किसका दोष।
2
कभी नही थम सकता है
उसकी आंख का नीर
जिसने समझी
दूजे की पीर को अपनी पीर।
3
सूरज दिन भर का थका
चला सांझ के गांव
सारे पंछी लौटते
अपने अपने ठावँ।
4
गुरु मिले बड़े भाग से
करलो आज प्रणाम
करना ऐसा काम की
बड़े गुरु का नाम।
5
हँसते हँसते ढो लिया
जीवन भर का बोझ
अस्त शाम को होता हैं
सूरज भी तो रोज।
6
तेरी ज्योत की रोशनी
सदा दिखती राह,
भटक न जाऊ मैं कहि
थाम के रखना बाँह।
7
चंदा तेरी चांदनी
जैसे मलय पवन
नींद न आये जाने क्यू
लगता नहीं ये मन।
8.
आर्यावृत इस देश में ,
तम्बू में भगवान ।
जरा आप बतलाइए ,
कैसे हो कल्याण ।।
9.

गर्भ जेल से छूटकर फंसे मोह की जेल
वो ही जाने होगी कब इस जीव की बेल।

©डॉ दिलीप बच्चानी

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