आलीशान मल्टीप्लेक्स की सिल्वर स्क्रीन पर चलती रोमांटिक फिल्म और सबसे ऊपर की पंक्ति में कोने की सीटो पर बैठे विनीत और रीटा।
फ़िल्म का पूरा आनंद लेती हुई रीटा पॉपकॉर्न खा रही थी जबकि विनीत की रुचि फ़िल्म में कम रीटा में ज्यादा थी।
कभी पॉपकॉर्न लेने के बहाने कभी अकारण दो तीन बार विनीत रीटा को छू चुका था।
पर इस बार जैसे ही उसका हाथ रीटा की जांघ को छुआ रीटा ने तुरंत परे हटा दिया।
अपना मोबाइल निकाल रीटा ने कुछ टाइप किया।
विनीत के स्क्रीन पर मैसेज का नोटिफिकेशन फ्लैश हुआ।
हम सिर्फ दोस्त है और इसी भरोसे पर मैं तुम्हारे साथ फ़िल्म देखने आ गई।
मेरे मॉर्डन होने का कोई गलत मतलब मत निकालो,अगली बार कोई हरकत की न तो सीधा थप्पड़ पड़ेगा।
विनीत मुस्करा दिया शायद उसकी तलाश पूरी हो चुकी थी।
उसे उसकी जीवनसंगिनी मिल चुकी थी।
"मृत्यु का मोल" ( व्यंग्य कविता) अंजान मरे — तो चुपचाप साइड से निकल लो, ना आँसू, ना सवाल — बस भीड़ में खुद को बचा लो। पड़ोसी मरे — तो पूछ लो संस्कार का समय, कंधा न सही, कम से कम दिखा दो थोड़ा नमन। जान-पहचान वाला गया — तो फेसबुक पर "ॐ शांति" लिख दो, दिल से नहीं, टाइपिंग स्पीड से दुख नाप लो। कोई अपना गया — तो आँसू भी प्रॉपर्टी के वजन से गिरते हैं, ग़म भी वसीयत के काग़ज़ों में सुकून ढूंढता फिरता है। और जब आप मरें — तो सोचो, कौन रोएगा सच में? कौन होगा जो तुम्हारे बिना रातों को जागेगा? मौत तो सबकी बराबर होती है — पर इस दुनिया में दुख भी रिश्तों के रैंक से बाँटा जाता है। डॉ दिलीप बच्चानी पाली मारवाड़,राजस्थान।
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