कॉलेज के बगल वाली सड़क के उस पार फास्टफूड के ठेलो को लंबी कतार थी।
चल सचिन चाउमीन खाते है रहने दे विनय रोज वो ही चाउमीन,पास्ता,बर्गर,पिज़्ज़ा बोर हो गए यार।
कुछ नया देखते है वो देख एक नया गोलगप्पे वाला आया है।
ठीक है चल।
गोलगप्पे खाते हुए सचिन ने ठेले वाले से पूछा कितने दिन से यहाँ ठेला लगा रहे हो चाचा।
स्वाद तो बहुत बढ़िया है गोलगप्पे का।
पांच दिन हुए बेटा गाँव से आये हुए। गोलगप्पे क्या हमारी चाट पकोड़ी भी बहुत स्वादिष्ट है देसी घी में तलते है।
पर क्या बताये यहाँ कोई ग्राहकी नही है सब लोग चाउमीन, मंचूरियन, पास्ता, पिज़्ज़ा,मोमोज़ खाते है हमारे पास तो कोई इक्का दुक्का ही आते है।
अभी रुको चाचा तुम्हारी समस्या का समाधान करते है।
दोनों दौड़ कर पास वाले मॉल में घुस गये कुछ देर बाद हाथ मे हैंडबैग लेकर आते ही ठेले वाले को थमा दिया।
ये सब क्या है बेटा।
देखो चाचा ये है टोपी इस को सर पर लगाकर रखा करो।
औऱ ये है एप्रेन इसे कपड़ो के ऊपर पहन लिया करो।
औऱ सबसे जरूरी ये ग्लब्स जब भी गोलगप्पे खिलाओ ये पहन कर खिलाओ।
फिर देखो तुम्हारी ग्राहकी कैसे चमकती है।
अच्छा कल मिलेंगे।
अरे ! बेटा इस सब का पैसा तो लेते जाओ।
गोलगप्पे,चाट पकोड़ी खाकर बराबर कर देंगे।
ओके बाय।
जुग जुग जियो बेटा सदा खुश रहो।
(अपने आँसू पोछते हुए)
"मृत्यु का मोल" ( व्यंग्य कविता) अंजान मरे — तो चुपचाप साइड से निकल लो, ना आँसू, ना सवाल — बस भीड़ में खुद को बचा लो। पड़ोसी मरे — तो पूछ लो संस्कार का समय, कंधा न सही, कम से कम दिखा दो थोड़ा नमन। जान-पहचान वाला गया — तो फेसबुक पर "ॐ शांति" लिख दो, दिल से नहीं, टाइपिंग स्पीड से दुख नाप लो। कोई अपना गया — तो आँसू भी प्रॉपर्टी के वजन से गिरते हैं, ग़म भी वसीयत के काग़ज़ों में सुकून ढूंढता फिरता है। और जब आप मरें — तो सोचो, कौन रोएगा सच में? कौन होगा जो तुम्हारे बिना रातों को जागेगा? मौत तो सबकी बराबर होती है — पर इस दुनिया में दुख भी रिश्तों के रैंक से बाँटा जाता है। डॉ दिलीप बच्चानी पाली मारवाड़,राजस्थान।
Comments
Post a Comment