बदनाम गलियां
इत्र की खुशबू
पान की महक
शराब की गंध
डगमगाते कदम
तंबाकू की बदबू
रंगी पुती जर्जर इमारते
बेशर्म इशारे
पेट की
मजबूरी
कोई
हवस का
भूखा!
नशे में धुत्त
नादान कदम
अंधेरी सीढ़ियां
लड़खड़ाते कदम
असुरक्षित सम्बन्ध
जानलेवा रोग
दर्दनाक मौत।
"मृत्यु का मोल" ( व्यंग्य कविता) अंजान मरे — तो चुपचाप साइड से निकल लो, ना आँसू, ना सवाल — बस भीड़ में खुद को बचा लो। पड़ोसी मरे — तो पूछ लो संस्कार का समय, कंधा न सही, कम से कम दिखा दो थोड़ा नमन। जान-पहचान वाला गया — तो फेसबुक पर "ॐ शांति" लिख दो, दिल से नहीं, टाइपिंग स्पीड से दुख नाप लो। कोई अपना गया — तो आँसू भी प्रॉपर्टी के वजन से गिरते हैं, ग़म भी वसीयत के काग़ज़ों में सुकून ढूंढता फिरता है। और जब आप मरें — तो सोचो, कौन रोएगा सच में? कौन होगा जो तुम्हारे बिना रातों को जागेगा? मौत तो सबकी बराबर होती है — पर इस दुनिया में दुख भी रिश्तों के रैंक से बाँटा जाता है। डॉ दिलीप बच्चानी पाली मारवाड़,राजस्थान।
Bahut khub bhai
ReplyDeleteRaj banjara
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