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कविता वीररस

आंदोलन की आड़ में छुप,
लगे जिहाद के नारे है
हमको ये मंजूर नही है,
ये फ़साद के नारे है। 

देश विरुद्ध जो बोल रहे हो
कुछ तो थोड़ा शर्म करो,
या फिर चुल्लू भर पानी मे
जाओ जाकर डूब मरो। 

सारे मिलकर लड़े चुनाव थे
पर जनता ने दुत्कार दिया,
फिर से अपना रूप बदलकर
मिल गए अब ये सारे है। 

हम राम के वंशज है ठहरे
हमे हिंसा में विश्वास नही,
पर इतना तो तुम भी जानो
हम निस्सहाय निःश्वास नही। 

हिंद भूमि यह पूण्य वसुंधरा
हम सबकी यह माता है,
हम सबको है प्यारी ये माँ
हम भी इसके प्यारे है। 

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नज़्म: किसी के पास बैठो तो अदब से बैठो, ये पास होना सिर्फ़ जगह भरना नहीं होता, ये किसी के दिल में अपनी जगह बनाना होता है। नज़दीकियाँ अक्सर इंसान को हल्का कर देती हैं, लहज़ा बदल जाता है, अंदाज़ ढल जाता है— पर तुम अपनी तहज़ीब को थामे रखना। जब दूर हो जाओ और फासले बातों से ज़्यादा लंबे हो जाएँ, तब भी अपने शब्दों को गिरने मत देना, अपनी यादों को रूखा मत होने देना। क्योंकि अदब— सिर्फ़ पास होने की ज़रूरत नहीं, ये दूरियों में भी जिंदा रहना चाहता है। इसलिए— जब पास बैठो तो अदब से बैठो, और जब दूर हो जाओ तब भी बेअदब मत होना।
उतारन ऐ चड़ावन जी कहानी आहे सीदी सादी जिंदगी बेस्वाद, बेमानी आहे।  कहिंखे घट कहिंखे वधिक मालिक़ डिनो आ मा शुकर भी करा हिय त बेईमानी आहे।