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लघुकथा



शीर्षक- अपना कंधा अपनी सलीब। 

तालियों की गड़गड़ाहट के साथ मंच पर रखे डायस से अपनी खनकती आवाज में रश्मि प्रभा ने अपनी बात कहना शुरू किया। 
अमूमन कम ही होता है कि किसी साहित्यिक कार्यक्रम में पूरा सभागार खचाखच भरा हुआ हो। 
पर आज साहित्य संगम संस्था के रजत जयंती समारोह में साहित्य की हर विधा के लेखक और पाठक मौजूद है। 
अभी आप सब की उपस्थिति में आदरणीय मंत्री महोदय द्वारा श्री अश्विनी शर्मा जी की पुस्तक का विमोचन किया गया। 
हम चाहेंगे कि अश्विनी शर्मा जी अपनी पुस्तक के बारे में कुछ कहे। 
तालियों की गड़गड़ाहट के बीच अश्विनी शर्मा डायस तक पहुचे। 
साथियो आप सभी के स्नेह और सम्मान से अभिभूत हूँ तथा साहित्य संगम परिवार का बहुत बहुत शुक्रगुजार भी। मैं कोई प्रोफेशनल लेखक 
नही हूँ। मैने जो अपने जीवन मे देखा,सीखा, अनुभव किया बस वो ही लिखने की कोशिश की है।अचानक हुए एक सड़क हादसे ने मुझसे मेरा सब कुछ छीन लिया। पढ़ना लिखना सब कुछ छूट गया,जीवन बेमानी सा हो गया था। 
गहन अवसाद के उन क्षणों में मेरे पोते ने मेरे दोस्त का किरदार अदा किया और मुझे फिर कलम थामने पर मजबूर कर दिया। 
औऱ एक बात मैने सीख ली *जिंदगी की सलीब को उठाना तो अपने ही कंधो पर पड़ेगा*। 
"मौत से पहले मरा नही जा सकता"। 

डॉ दिलीप बच्चानी 
पाली मारवाड़,राजस्थान। 
9829187616
रचना काल-जनवरी 21

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