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बस यूँही

निकालो कानो से इयरफोन नदी का संगीत सुनो
जो पहुचा सके तुंम्हे सुकूँ तक ऐसी रहा चुनो

समय ही पूंजी हैं मत व्यर्थ गवाओ इसे
समय मिले तो घर के बुजुर्गों की बात सुनो

दुनिया क्या कहती हैं क्या नही ये मत सुनो
कुछ पल मौन बैठो अपने दिल की बात सुनो

बड़े मशहूर हो फेसबुक और ट्विटर पर यारो
कभी पापा के पास बैठो उनके जज्बात सुनो

चलो छोडो मत मनो मेरी न मेरी बात सुनो
आहट को पहचानो आने वाले कल की बात सुनो

                                डॉ दिलीप बच्चानी
                                पाली राजस्थान

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नज़्म: किसी के पास बैठो तो अदब से बैठो, ये पास होना सिर्फ़ जगह भरना नहीं होता, ये किसी के दिल में अपनी जगह बनाना होता है। नज़दीकियाँ अक्सर इंसान को हल्का कर देती हैं, लहज़ा बदल जाता है, अंदाज़ ढल जाता है— पर तुम अपनी तहज़ीब को थामे रखना। जब दूर हो जाओ और फासले बातों से ज़्यादा लंबे हो जाएँ, तब भी अपने शब्दों को गिरने मत देना, अपनी यादों को रूखा मत होने देना। क्योंकि अदब— सिर्फ़ पास होने की ज़रूरत नहीं, ये दूरियों में भी जिंदा रहना चाहता है। इसलिए— जब पास बैठो तो अदब से बैठो, और जब दूर हो जाओ तब भी बेअदब मत होना।
उतारन ऐ चड़ावन जी कहानी आहे सीदी सादी जिंदगी बेस्वाद, बेमानी आहे।  कहिंखे घट कहिंखे वधिक मालिक़ डिनो आ मा शुकर भी करा हिय त बेईमानी आहे।