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मासूम बचपन(लघुकथा)

*मासूम बचपन* 

हमाम-दस्ते में कूटी जाती हुई अदरक और इलायची की सुगंध...उबलते दूध की महक...जलती हुई गैस भट्टी की आंच ... मुड्डौ पर जमे लोगों के बीच अखबार की सुर्खियों पर चलती नुक्कड़ बहस...

चाय थड़ी के काउंटर के निचले खण्डों में भरे हुए डिस्पोजल कपों के बंडल, वहीं पास में रखे हुए कुछ कुल्हड़, जो अब सिर्फ विशेष फरमाइश पर काम आते थे, दो चार चीनी मिट्टी के कप-प्लेट के सेट,  कुछ कांच के गिलास जिनका इस्तेमाल हुए जमाना गुजर गया था, मिल कर मानो कल आज कल को एक साथ ले आए थे। 

उपेक्षा के दौर से गुजर रहे कप-प्लेट सेट ने डिस्पोजल कपों के बंडलों को हिकारत से देखते हुए कहा,"क्या जमाना आ गया है, चाय पॉलिथीन में पैक होती है, डिस्पोजल कप में पी जाती है और फेंक दिए जाते है सड़को-पटरियों पर। नुक्कड़,चौराहे, गांव गली जहाँ देखो डिस्पोजल का कचरा ही कचरा।"
 
कुल्हड़ मुस्कुरा कर बोला "रफ्तार का जमाना है, सब काम फटाफट तेजी से निपटाया जाता है। 
एक हमारा दौर था, रात भर कुल्हड़ों को पानी में भिगो कर रखा जाता था। फिर धोकर उसमें चाय परोसी जाती थी और लोग बड़े चाव से सुकून के साथ चाय की चुस्कियां लेते थे। फिर कप-प्लेट और कांच के गिलास आ गए और अब ये डिस्पोजल।" 

अब तक चुपचाप बैठे डिस्पोजल कप से रहा न गया, वो बोल बैठा-  "कुल्हड़ दादा, आपकी स्वीकार्यता और श्रेष्ठता को कोई नहीं नकार सकता। सही मायने में पर्यावरण के हित के लिए आपका ही उपयोग सर्वश्रेष्ठ है, परंतु आपके साथ समस्या रही भंडारण और उपलब्धता की। 
लेकिन इन कप-प्लेट और कांच के गिलासों को मेरी आलोचना का कोई अधिकार नही।"

"क्यों भाई? क्यों? कारण बताओ ..?" उत्तेजना में कप-प्लेट बोले। 

"जब इन चीनी मिट्टी और कांच के बर्तनों का दौर था, तब लगभग हर चाय की दुकान पर इन्हें मांजने के लिए मौजूद होता था एक छोटा बच्चा।" 
डिस्पोजल कप आत्मविश्वास से कह उठा- " मै अच्छा हूँ, बुरा हूँ, कचरा पैदा करने वाला हूँ या पर्यावरण का शत्रु। परंतु, मै बड़े गर्व से कह सकता हूँ कि *मैने बचाया है कई  मासूमो का बचपन*"

सभी मौन सभी निररुतर।

लेखक- डॉ दिलीप बच्चानी
पाली मारवाड़,राजस्थान।

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