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गजल

जहाँ मौत के बाद के सपने बेचे जाते है
वो किस्से यहाँ मजहब कहलाए जाते है।

जीते जी दो घूट भी पीना हराम है जिन्हें
उन्हें शराब के दरिया दिखलाए जाते है। 

यहाँ तो हुस्न को छुपाते पर्दे की आड़ में
वे नादाँ हूरो के हुस्न से बहलाए जाते है। 

जो जीते है तमाम उम्र तपन में उमस में
वे जहन्नुम की आग से दहलाए जाते है। 

हैवन, स्वर्ग,जन्नत कहो या कहो बहिश्त
मासूम दिल कुछ यूँही बरगलाए जाते है। 

अगर संतुष्ट हो तो घर भी जन्नत ही है
भटकने वाले तो यूँ भी भरमाये जाते है। 

वो परम् तो मौजूद है तुम में और मुझ में
और हम यूँही बेवजह घबराये जाते है। 




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नज्म

नज़्म: किसी के पास बैठो तो अदब से बैठो, ये पास होना सिर्फ़ जगह भरना नहीं होता, ये किसी के दिल में अपनी जगह बनाना होता है। नज़दीकियाँ अक्सर इंसान को हल्का कर देती हैं, लहज़ा बदल जाता है, अंदाज़ ढल जाता है— पर तुम अपनी तहज़ीब को थामे रखना। जब दूर हो जाओ और फासले बातों से ज़्यादा लंबे हो जाएँ, तब भी अपने शब्दों को गिरने मत देना, अपनी यादों को रूखा मत होने देना। क्योंकि अदब— सिर्फ़ पास होने की ज़रूरत नहीं, ये दूरियों में भी जिंदा रहना चाहता है। इसलिए— जब पास बैठो तो अदब से बैठो, और जब दूर हो जाओ तब भी बेअदब मत होना।
उतारन ऐ चड़ावन जी कहानी आहे सीदी सादी जिंदगी बेस्वाद, बेमानी आहे।  कहिंखे घट कहिंखे वधिक मालिक़ डिनो आ मा शुकर भी करा हिय त बेईमानी आहे।