हर मंगलवार की तरह आज भी पुनीत अपनी दादी को लेकर हनुमानजी के मंदिर आया था।
दर्शन करने,प्रसाद ग्रहण करने के बाद थोड़ी देर मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर पुनीत की दादी बाहर कतार में बैठे भिखारियों को दान करने के लिए आगे बढ़ने लगी।
रुकिए!दादी,आज आप इन्हें ये पैसे न देकर एक ऐसा गिफ्ट दीजिये।
"जिससे इन्हें कभी भीख न मांगनी पड़े"
ऐसा क्या गिफ्ट हो सकता है?
एक मिनट रुकिए,अभी दिखाता हूँ।
पुनीत कार से कुछ पैकेट उठा कर ले आया।
इन डब्बो में ऐसा क्या है जो इन्हें कभी भीख नही मांगनी पड़ेगी।
इनमे वेट् मशीन है,आज से ये हाथ फैला कर पैसे नही मांगेंगे,बल्कि लोगो का वजन तोलकर सम्मान पूर्वक पैसे कमाएंगे।
वाह!बेटा ये तो तूने बड़ा ही दूरदर्शितापूर्ण कार्य किया है।
भिखारियों को पैकेट बाँटने, मशीन को चलाने का तरीका समझाने के बाद, दादी बोली।
"किसी को पैसे का दान देने से कई गुना बेहतर है आत्मसम्मान का दान दिया जाए'।
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