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गजल।


हमारी बेवकूफ़ियों का अंजाम ये हुआ,
खड़े हैं आज फिर हम उसी मुकाम पर।

हम अपने ही बनाए दायरों में क़ैद रहे,
नज़र गई ही नहीं एक भी आयाम पर।

जो सच था सामने, उससे नज़र चुरा बैठे,
गुमाँ किए रहे बस अपने ही इल्हाम पर।

हर एक बार वही दास्ताँ दोहराई है,
ठहर गए हैं क़दम फिर उसी मुकाम पर।

सफ़र में साथ जो था, आइना ही था अपना,
मगर यक़ीं न किया हमने उसके पैगाम पर।

उठे थे हाथ बदलने को अपनी तक़दीरें,
मगर झुके ही रहे वक़्त के निज़ाम पर।



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नज्म

नज़्म: किसी के पास बैठो तो अदब से बैठो, ये पास होना सिर्फ़ जगह भरना नहीं होता, ये किसी के दिल में अपनी जगह बनाना होता है। नज़दीकियाँ अक्सर इंसान को हल्का कर देती हैं, लहज़ा बदल जाता है, अंदाज़ ढल जाता है— पर तुम अपनी तहज़ीब को थामे रखना। जब दूर हो जाओ और फासले बातों से ज़्यादा लंबे हो जाएँ, तब भी अपने शब्दों को गिरने मत देना, अपनी यादों को रूखा मत होने देना। क्योंकि अदब— सिर्फ़ पास होने की ज़रूरत नहीं, ये दूरियों में भी जिंदा रहना चाहता है। इसलिए— जब पास बैठो तो अदब से बैठो, और जब दूर हो जाओ तब भी बेअदब मत होना।
अब गरीबी का आलम ये हुआ प्लास्टर उखड़ने लगे हैं दीवारों से। 
उतारन ऐ चड़ावन जी कहानी आहे सीदी सादी जिंदगी बेस्वाद, बेमानी आहे।  कहिंखे घट कहिंखे वधिक मालिक़ डिनो आ मा शुकर भी करा हिय त बेईमानी आहे।