Skip to main content

गजल


हर तारीफ़ में सच्चाई हो, ज़रूरी तो नहीं,
पीठ पीछे लोग क्या-क्या नहीं कहते।

सामने आकर तो सब हँसकर मिला करते हैं,
दिल की बात मगर खुलकर नहीं कहते।

चेहरे पढ़ना भी यहाँ आसान कहाँ होता है,
लोग हर राज़ को सच-सच नहीं कहते।

जिनसे उम्मीद थी साया भी बनेंगे मेरे,
वक़्त आने पे वो अच्छा नहीं कहते।

ख़ुद को आईना दिखाना भी गुनाहों सा लगे,
लोग अपने ही को सच्चा नहीं कहते।

ज़हर लफ़्ज़ों में घोलें तो हुनर मानें उसे,
सीधी बातों को यहाँ अच्छा नहीं कहते।

‘दिलीप’ अब तो तजुर्बों ने सिखा दी ये बात,
हर मुस्कान को हम सच्चा नहीं कहते। 

Comments

Popular posts from this blog

मृत्यु का मोल। (कविता)

"मृत्यु का मोल" ( व्यंग्य कविता) अंजान मरे — तो चुपचाप साइड से निकल लो, ना आँसू, ना सवाल — बस भीड़ में खुद को बचा लो। पड़ोसी मरे — तो पूछ लो संस्कार का समय, कंधा न सही, कम से कम दिखा दो थोड़ा नमन। जान-पहचान वाला गया — तो फेसबुक पर "ॐ शांति" लिख दो, दिल से नहीं, टाइपिंग स्पीड से दुख नाप लो। कोई अपना गया — तो आँसू भी प्रॉपर्टी के वजन से गिरते हैं, ग़म भी वसीयत के काग़ज़ों में सुकून ढूंढता फिरता है। और जब आप मरें — तो सोचो, कौन रोएगा सच में? कौन होगा जो तुम्हारे बिना रातों को जागेगा? मौत तो सबकी बराबर होती है — पर इस दुनिया में दुख भी रिश्तों के रैंक से बाँटा जाता है। डॉ दिलीप बच्चानी  पाली मारवाड़,राजस्थान।

आलेख

सोशल मीडिया और राष्ट्रीय संप्रभुता नेपाल में सोशल मीडिया बैन को लेकर जारी विरोध केवल एक देश का मामला नहीं है, बल्कि यह पूरे विश्व के लिए चिंता का विषय है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने सूचना के आदान-प्रदान को सरल बनाया है, लेकिन आज यही माध्यम लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को अस्थिर करने का औजार भी बनता जा रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराने वाली बड़ी कंपनियाँ अपने मुनाफ़े के लिए तो हर देश में सक्रिय रहना चाहती हैं, किंतु उस देश के कानून और नियमों का पालन करने से कतराती हैं। यह प्रवृत्ति राष्ट्रीय संप्रभुता के लिए सीधा खतरा है। हाल के वर्षों में श्रीलंका, बांग्लादेश और अब नेपाल में देखा गया है कि किस प्रकार युवाओं के असंतोष को सोशल मीडिया पर उकसाकर बड़े आंदोलनों का रूप दिया गया। सत्ता परिवर्तन तक की कोशिशें इन माध्यमों से संभव हो रही हैं। इसमें केवल बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ ही नहीं, बल्कि विपक्षी दलों और अंतरराष्ट्रीय शक्तियों का भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हाथ रहता है। यह स्थिति बेहद खतरनाक है, क्योंकि अब यह स्पष्ट हो चुका है कि सोशल मीडिया कंपनियाँ किसी भी देश की आंतरिक स्थिरता को प्रभावित क...

नज्म

नज़्म: किसी के पास बैठो तो अदब से बैठो, ये पास होना सिर्फ़ जगह भरना नहीं होता, ये किसी के दिल में अपनी जगह बनाना होता है। नज़दीकियाँ अक्सर इंसान को हल्का कर देती हैं, लहज़ा बदल जाता है, अंदाज़ ढल जाता है— पर तुम अपनी तहज़ीब को थामे रखना। जब दूर हो जाओ और फासले बातों से ज़्यादा लंबे हो जाएँ, तब भी अपने शब्दों को गिरने मत देना, अपनी यादों को रूखा मत होने देना। क्योंकि अदब— सिर्फ़ पास होने की ज़रूरत नहीं, ये दूरियों में भी जिंदा रहना चाहता है। इसलिए— जब पास बैठो तो अदब से बैठो, और जब दूर हो जाओ तब भी बेअदब मत होना।