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पत्रकारिता-"उद्भव पराभव"।

पत्रकार के सफर का प्रारंभ फील्ड में भाग दौड़ करके काम की खबर निकाल कर लाना होता है। 
उसके लिए धक्के खाने पड़ते है, तिकड़में लगानी पड़ती है, और उसके बाद भी खबर संपादक को पसंद आ जायेगी इस बात की कोई गारंटी नहीं होती। 
फिर धीरे धीरे वो पत्रकार वरिष्ठ होता जाता है, अब उसे खबरों के लिए धक्के नही खाने पड़ते,खबरे खुद चल कर उसके पास आती है। और उसकी खबरों को अब नकारा भी नही जाता बल्कि फ्रंट पेज की शोभा बनाया जाता है। 

उसके बाद एक वक्त आता है जब वो पत्रकार संपादक बन जाता है। 
अब तो न वो खबर के पीछे भागता है, न खबर उसके पीछे भागती है। 
अब वो नैरेटिव के पीछे भागता है, बड़े-बड़े संपादकीय आलेख लिखता है, लिखता क्या है अपनी सोच अपना नैरेटिव दुसरो पर थोपने की कोशिश करता है। 

अब बात करते है दृश्य मीडिया की। कमोबेश यहा भी स्थिति वोही है। 
पहले फील्ड में भगदौड़ फिर,टी वी पर एंकरिंग,फिर वरिष्ठ हो जाने पर अपना खुद का एक घँटे का टीवी शो। 
जहा खबरे नही उस पत्रकार की विचारधारा परोसी जाती है,पॉजिटिव या नेगेटिव नैरेटिव क्रिएट किया जाता है। 

किसी भी एक घटना को लेकर कई-कई दिनों तक मुर्ग़े लड़वाये जाते है।मानो की उन दिनों में पूरे विश्व मे और कोई घटना घटित ही नही होती,केवल और केवल एक मुद्दा बस। 
फिर अचानक उस मुद्दे को उठाकर फेक दिया जाता है और एक नया मुद्दा क्रिएट किया जाता है। 

दरअसल आप तय नही करते कि आप क्या देखेंगे,क्या सोचेंगे,क्या तय करेंगे।
ये बात मीडिया हाउस में बैठे बड़े बड़े वरिष्ठ पत्रकार और उनके मालिक तय करते है कि आप क्या देखेंगे,क्या सोचेंगे,क्या तय करेंगे। 

अरे!अभी किस्सा खत्म नही हुआ है, अभी एक आख़िरी मोड़ और बाकी है। 
आपको याद होगा हमने किस्सा पत्रकार के शुरुआती दिनों से शुरू किया था, अब चलते है पटाक्षेप की तरफ। 

जब टीवी चैनलों से,इन बड़े-बड़े पत्रकारों को निकाल दिया जाता है तब ये अपनी बची खुची भड़ास निकालने के लिए बनाते है अपना खुद का एक यूट्यूब चैनल और फिर,किस्सा तो वो ही नैरेटिव बनाने और बेचने का है। 

इति श्री नेटेटिव कथा। 

डॉ दिलीप बच्चानी
424,सुभाष नगर A,
पाली मारवाड़, राजस्थान। 

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