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काबिल?

अनुकम्पा नॉकरी

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आलेख

सोशल मीडिया और राष्ट्रीय संप्रभुता नेपाल में सोशल मीडिया बैन को लेकर जारी विरोध केवल एक देश का मामला नहीं है, बल्कि यह पूरे विश्व के लिए चिंता का विषय है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने सूचना के आदान-प्रदान को सरल बनाया है, लेकिन आज यही माध्यम लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को अस्थिर करने का औजार भी बनता जा रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराने वाली बड़ी कंपनियाँ अपने मुनाफ़े के लिए तो हर देश में सक्रिय रहना चाहती हैं, किंतु उस देश के कानून और नियमों का पालन करने से कतराती हैं। यह प्रवृत्ति राष्ट्रीय संप्रभुता के लिए सीधा खतरा है। हाल के वर्षों में श्रीलंका, बांग्लादेश और अब नेपाल में देखा गया है कि किस प्रकार युवाओं के असंतोष को सोशल मीडिया पर उकसाकर बड़े आंदोलनों का रूप दिया गया। सत्ता परिवर्तन तक की कोशिशें इन माध्यमों से संभव हो रही हैं। इसमें केवल बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ ही नहीं, बल्कि विपक्षी दलों और अंतरराष्ट्रीय शक्तियों का भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हाथ रहता है। यह स्थिति बेहद खतरनाक है, क्योंकि अब यह स्पष्ट हो चुका है कि सोशल मीडिया कंपनियाँ किसी भी देश की आंतरिक स्थिरता को प्रभावित क...
अब गरीबी का आलम ये हुआ प्लास्टर उखड़ने लगे हैं दीवारों से। 

रविवार(कविता)

कल सुबह देर तक सोएँगे, नींद को भी आज़ादी देंगे, घड़ी की सुइयों से कुछ पल अपना रिश्ता तोड़ेंगे। कल फ़िल्म देखने जाएँगे, हँसी के दो पल चुरा लाएँगे, पूरा दिन यूँ ही, बेफ़िक्री के नाम लिख जाएँगे। रविवार है, छुट्टी का लुत्फ़ लेना तो बनता है, ज़िंदगी को ज़रा अपने ढंग से जी लेना तो बनता है। इन ख्वाबों के बीच एक खामोश सवाल खड़ा है। काश! मज़दूर के हाथों को भी मिलती कभी ठहराव की राहत, किसान की थकी आँखों में भी उगता एक सुकून भरा रविवार, दुकानदार के बंद शटर पर भी लिखा होता—"आज छुट्टी है", और उसके घर में भी हँसी का एक दिन उतरता। रविवार सिर्फ कैलेंडर का नहीं, हर इंसान के हिस्से का होना चाहिए।