मैं तो कितनी बार आपसे कह कह के तक गई की कोने वाले स्टोर रूम में एक पलंग और पँखा लगवा दीजिये। अलका पलँग की चद्दर ठीक करते हुए बोली। माँजी को वहाँ शिफ्ट कर देते है कितनी दिक्कत ह...
जब से फेसबुक तैयार हो गयी है तब से जिंदगी इश्तेहार हो गईं है लड़के बेचारे लाइक्स को तरसे लड़कियों पर भरमार हो गयी है अब हर रोज लिखते है वॉल पर कलम बेचारी बेकार हो गयी है यहाँ सब ...
टुटते सपने (लघुकथा) साँवला रंग लंबा ऊँचा कद साधारण नयन नक्श आत्मविश्वास से लबरेज सलोनी ट्रेक सूट पहनकर जब अपने कॉलेज या मोहहले की गली से निकलती तो किसी लड़के की हिम्मत न होत...
आदित्य के बार बार मना करने पर भी साजिद आकर कमरे के कोने में बैठ जाता। उसकी माँ बाहर बरामदे में पोछा लगा रही थी। तभी फोन बजा। क्या आदित्य कॉफ़ी डे आ रहा है क्या नेहा भी साथ है। ...
नरक से बाहर ( लघुकथा ) बेटे की रोज रोज की पैसे की डिमांड पूरी कर कर के वीरेंद्रनाथ परेशान हो चुका था,और फिर आज उसका रिजल्ट देखकर तो दिमाग ही खराब हो गया। देहली से सीधा पूना पहुँ...
जीवन की शिक्षा ( कविता ) रास्ते मे पड़ने वाला मेरा विद्यालय पूछता है मुझसे कई सवाल ? एक दिन उसने मुझसे कहा क्यो उलझा रहता है तू आर्थिक संकट में, जबकि मैंने तुझे सिखाया था मितव...
घरौंदे की ओर ( लघुकथा ) वेटर दो कॉफी लाना। हांविवेक अब बोल क्या बात है? सुबह से इतना परेशान सा क्यो है। क्या बताऊँ यार कल रात ढंग से सो भी नही सका और.....? कही स्वाती भाभी से कोई झगड़ा? ...