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लघुकथा

कॉलेज के बगल वाली सड़क के उस पार फास्टफूड के ठेलो को लंबी कतार थी। चल सचिन चाउमीन खाते है रहने दे विनय रोज वो ही चाउमीन,पास्ता,बर्गर,पिज़्ज़ा बोर हो गए यार। कुछ नया देखते है वो दे...

गजल

कैसा रहा आपका इस बार का सफर खत्म तो होता ही है हर बार का सफर। कुछ लोग चल रहे है रफ्तार से बहुत मानो कर रहे हो आर पार का सफर। नाव का सफर अलग है यहाँ और अलग है  यहाँ पतवार का सफर। कु...

दोहा

आज रवि अवकाश पर ठंड बड़ी विकराल करो घर आराम आज ओढ़ो स्वेटर शॉल। ©डॉ दिलीप बच्चानी

गजल

रास्ता मुश्किल है आसान नहीं है रुक जाना भी तो समाधान नही है। दर्द थकान पसीना पैरों में जलन किसी भी शै से वो परेशान नही है। दोराहो चौराहों के असमंजस भी है पर चलने वाला भी अंजान नही है। राह से भटकाने वाले भी बहुत है इन बातों से भी वो हैरान नही है। धूल है धूप है मिट्टी के गुबार भी है राही किसी बात से पशेमान नही है। कंकरों कांटो से भरी पथरीली राह वो जानता है मंजिल आसान नही है

लघुकथा

आलीशान मल्टीप्लेक्स की सिल्वर स्क्रीन पर चलती रोमांटिक फिल्म और सबसे ऊपर की पंक्ति में कोने की सीटो पर बैठे विनीत और रीटा। फ़िल्म का पूरा आनंद लेती हुई रीटा पॉपकॉर्न खा र...

दोहा

आर्यावृत इस देश में , तम्बू में भगवान । जरा आप बतलाइए , कैसे हो कल्याण ।।

घोटाले कविता

भ्र्ष्टाचार भविष्य है और वर्तमान घोटाले है संसद के ये सभी जानवर तीखे दांतो वाले है। आजकल तो जब भी देखो घोटाले डर घोटाले है पहले साले आग लगते बाद में उसमे घी डाल है अपनी भार...