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नरसंहार लघुकथा

नरसंहार ( लघुकथा) पापा पापा मेरी गुड़िया जल रही है.... रहने दे बेटी नयी ले आएंगे पुरे मोहल्ले में आग लगने के बाद अरविन्द क़ौल उसका परिवार और पूरा कुनबा बड़ी मुश्किल से जान बचाकर भा...

गजल

कोई न समझा कोई न जाना उलझा - उलझा ताना - बाना। कौन रहा है और कौन रहेगा चलता रहता आना - जाना। ये मेरा है और वो है उसका खेल - तमाशा खोना - पाना। तेरा - मेरा साथ तभी तक जब तक अपना आबो - दाना। ...

कुछ सबक

कुछ सबक... गाड़ी पर न मोबाइल का प्रयोग कीजिये जीवन अनमोल है सद्पयोग कीजिये। हैंडल छोड़कर स्टंट दिखाना महंगा पड़ेगा गर गिर गया तो फिर बैसाखियों पर चलेगा। सेल्फी खिचना आपको भटक...

एड्स

बदनाम गलियां इत्र की खुशबू पान की महक शराब की गंध डगमगाते कदम तंबाकू की बदबू रंगी पुती जर्जर इमारते बेशर्म इशारे पेट की मजबूरी कोई हवस का भूखा! नशे में धुत्त नादान कदम अं...

चमकी बुखार

ढाई साल की मुनिया घर पर खेलते खेलते अचानक सुस्त सी पड़ गयी और कुछ ही मिनटों में बेहोश हो गयी। रजिया ने दौड़कर मुनिया को गोदी में लिया और बदहवास सी हालत में अपने पति को बुलाया। अ...
कुछ कहा ना कुछ सुना करवट बदल कर सो गए बीवी भी पुरानी हो गई हम भी पुराने हो गए।
मेरे अंतस की पीड़ा जब स्याही में घुलती है कभी दोहा निकलता है कभी कविता निकलती है