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गजल

जो सूरज की तरह से यार जलना सीख जाएगा। अंधेरे चीरना, उनसे निकलना सीख जाएगा। न कोई हाथ पकड़ो ना सहारा दो उसे कोई, खुद ब खुद वो मेरे साथी संभलना सीख जाएगा। अभी मासूम है, मासूमियत जिंदा रहे उसमें, किताबें पढ़ के वो फितरत बदलना सीख जाएगा। सुनो ये दुनिया के दस्तूर, जैसे हथकड़ी कोई,  जिस तरह तुमने सीखा, वो भी चलना सीख जाएगा। यहां हर शख्स का अपना अलग किरदार होता है, समय को देख वो सांचे में ढलना सीख जाएगा‌। न दो तुम ज्ञान, ईश्वर ने सभी कुछ दे के भेजा है, अगर बंदर है तो निश्चित उछलना सीख जाएगा। अभी बच्चा है बचपना रहने तो दो तुम उसमे खिलौने देखकर खुद ही मचलना सीख जाएगा।

दीपावली

उजियारा जीते सदा,तम की होती हार संघर्षों के बाद अब, सजा राम दरबार।  सजा राम दरबार,अवध की छटा निराली सरयू तट मना रहा अब हर दिन दिवाली।

मृत्यु के बाद।

कुछ आंखे सजल होगी कुछ समय के लिए, कुछ स्मृतियां कुछ कुछ ह्रदयों में रह जाएंगी।  घर का एक बिस्तर रिक्त रह जायेगा और क्या हो जाएगा।  चप्पल स्टैंड की कतारों में  एक फालतू चप्पल रह जायेगी अलमारी में कुछ जोड़ी पुराने कपड़े बच जाएंगे।  जिन्हें बाद में फेंक दिया जाएगा और क्या हो जाएगा।  दवाई के पत्तो में कुछ गोलियां बच जाएंगी कुछ अधपढ़ी किताबे पूछे छूट जाएंगी।  जिन्हें फिर कभी न पढ़ा जाएगा।  और क्या हो जाएगा।  तुलसी रोज याद करेगी गुलमोहर पछतायेगा कुछ गमलों की सफाई  बाकी रह जायेगी।  जिन्हें अब करीने से सजाया जाएगा। और क्या हो जाएगा।  कुछ समय के लिए कमरा सुना हो जाएगा बिखरी चीजो को अब हटाया जाएगा।  इसे अब फिर से बसाया जाएगा।  और क्या हो जाएगा।  दीवार की किसी कील पर एक तस्वीर लटकाई जाएगी सूखे चंदन की माला भी पहनाई जाएगी।  दीवार पर एक पोस्टर बढ़ जाएगा।  और क्या हो जाएगा। 

गजल

कल क्या हो किसी को कोई खबर नहीं कल की फ़िक्र से अलहदा कोई बशर नही।  भटकता फिरता हूँ सुकून की तलाश में लगता है मुझको जैसे मेरा कोई घर नही। चेहरे को ढक को रखता है मुस्कराहटों से ऐसा नहीं है कि उसे कोई फ़िकर नही।  रात की स्याह परछाईया बढ़तीं ही जा रही लगता है इस रात की कोई सहर नही।  पूरे गुलशन में मुझे तितलियां नही दिखी लगता है इस गुलशन में गुलों का शजर नही।  मेरी तमाम खुशियां रहतीं है उस ओर उस ओर जाने को पर कोई डगर नही।  पा लिया इतना जिसका हकदार भी न था अब मौत भी आ जाये तो कोई डर नही।

रावण(कविता)

असफलता का भय तो रावण है ही सफलता का मद भी रावण है।  कुरूपता की ग्लानि तो रावण है ही सुंदरता का अहम भी रावण है।  परस्त्री का मोह तो रावण है ही स्वस्त्री की उपेक्षा भी रावण है।  स्वंय पर क्रोध तो रावण है ही दुष्टों पर दया भी रावण है।  अंधकार की कालिमा तो रावण है ही प्रकाश की चकाचौंध भी रावण है।  सत्य का अस्वीकार तो रावण है ही असत्य का अंगीकार भी रावण है। 

पानी (कविता)

सबसे सर्वश्रेष्ठ पानी वो है जिसे छूने मात्र से समस्त पापो का नाश हो जाता है, जिसे हम गंगाजल कहते है।  सबसे स्वच्छ पानी वो है जो किसी पहाड़ी झरने से कल कल करता हुआ बहता है और हमारी प्यास बुझाता है।  सबसे मीठा पानी वो है जो जेठ वैशाख की गर्मी में प्याऊ पर पथिको को पिला उन्हें विश्राम प्रदान करता है।  सबसे खारा पानी समुद्र का है परंतु वो भी पावन जल है क्योकि वो भी वाष्प बनकर हमे वर्षा प्रदान करता है।  सबसे महंगा पानी वो है जो मरुस्थल में हमारी माताएं बहने बड़ी दूर से अपने मटके मे भर अपने घर पर लाती है।  और सबसे अनमोल पानी वो है जो भक्ति से ओतप्रोत हो हरिचरणो में अश्रु के रूप में आँखों से गिरता है। 

हिंदी दिवस

इंग्लिश वाली गिटपिट छोड़े आओ हम हिंदी में बोले।  दिल से हिंदी को अपनाए आओ हम हिंदी के हो ले।  जनभाषा का सम्मान जिसे है उसकी मिश्री कानो में घोले।  पंथ प्रांत के भेद को भूले मिलकर सब हिंदी में बोले।