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छोड़ो गमो का भार यहाँ, खुशी जीवन आधार यहाँ एक सफर ही तो खत्म हुआ है,चलना बहुत है यार यहाँ। 

जंजीरे

जंजीरे वो नही है जो बंधती है आपके हाथ पांव और सीमित कर देती है आपको एक कोने में।  कुछ अदृश्य जंजीरे हम सभी को बांधे हुए है जो दिखती नही है, पर उनकी पकड़  बहुत मजबूत है।  वे जंजीरे है विचारों की जंजीरे।  जो रोकती है आपको किसी दूसरे विचार को सुनने,सोचने और समझने से।  धर्म की जंजीरे जात पात की जंजीरे समाज की जंजीरे परिवेश की जंजीरे प्रांत की जंजीरे भाषा की जंजीरे शिक्षा की जंजीरे।  और सबसे बड़ी जंजीर है इन सांसो की जंजीर जिसने हमे बांध रखा है इस नश्वर शरीर से।  जिस दिन टूट जाएगी ये जंजीर हम आजाद होंगे अंनत व्योम की यात्रा के लिए। 

कविता

कुछ पन्ने जिंदगी के फाड़ दिए जाएं तो बेहतर है।  हर पन्ने से गुलाब की खुशबू नही आती।  नजर बार बार उधर ही जाती है लिखी है जिन पन्नो में अठखेलियाँ तेरी।  जिन्हें पढ़कर हरबार आँखे नम हो हो जाती है न चाहते हुए भी, पढ़ता हूँ बार बार।  कामयाबियां,नाकामियां शिकायतें,शरारते जाने क्या क्या है छुपा इन पन्नो में।  इन पुराने पन्नो को छूना डायरी को सीने पर रख सो जाना, भुला देता है सब तकलीफों को। 

गजल

जो सूरज की तरह से यार जलना सीख जाएगा। अंधेरे चीरना, उनसे निकलना सीख जाएगा। न कोई हाथ पकड़ो ना सहारा दो उसे कोई, खुद ब खुद वो मेरे साथी संभलना सीख जाएगा। अभी मासूम है, मासूमियत जिंदा रहे उसमें, किताबें पढ़ के वो फितरत बदलना सीख जाएगा। सुनो ये दुनिया के दस्तूर, जैसे हथकड़ी कोई,  जिस तरह तुमने सीखा, वो भी चलना सीख जाएगा। यहां हर शख्स का अपना अलग किरदार होता है, समय को देख वो सांचे में ढलना सीख जाएगा‌। न दो तुम ज्ञान, ईश्वर ने सभी कुछ दे के भेजा है, अगर बंदर है तो निश्चित उछलना सीख जाएगा। अभी बच्चा है बचपना रहने तो दो तुम उसमे खिलौने देखकर खुद ही मचलना सीख जाएगा।

दीपावली

उजियारा जीते सदा,तम की होती हार संघर्षों के बाद अब, सजा राम दरबार।  सजा राम दरबार,अवध की छटा निराली सरयू तट मना रहा अब हर दिन दिवाली।

मृत्यु के बाद।

कुछ आंखे सजल होगी कुछ समय के लिए, कुछ स्मृतियां कुछ कुछ ह्रदयों में रह जाएंगी।  घर का एक बिस्तर रिक्त रह जायेगा और क्या हो जाएगा।  चप्पल स्टैंड की कतारों में  एक फालतू चप्पल रह जायेगी अलमारी में कुछ जोड़ी पुराने कपड़े बच जाएंगे।  जिन्हें बाद में फेंक दिया जाएगा और क्या हो जाएगा।  दवाई के पत्तो में कुछ गोलियां बच जाएंगी कुछ अधपढ़ी किताबे पूछे छूट जाएंगी।  जिन्हें फिर कभी न पढ़ा जाएगा।  और क्या हो जाएगा।  तुलसी रोज याद करेगी गुलमोहर पछतायेगा कुछ गमलों की सफाई  बाकी रह जायेगी।  जिन्हें अब करीने से सजाया जाएगा। और क्या हो जाएगा।  कुछ समय के लिए कमरा सुना हो जाएगा बिखरी चीजो को अब हटाया जाएगा।  इसे अब फिर से बसाया जाएगा।  और क्या हो जाएगा।  दीवार की किसी कील पर एक तस्वीर लटकाई जाएगी सूखे चंदन की माला भी पहनाई जाएगी।  दीवार पर एक पोस्टर बढ़ जाएगा।  और क्या हो जाएगा। 

गजल

कल क्या हो किसी को कोई खबर नहीं कल की फ़िक्र से अलहदा कोई बशर नही।  भटकता फिरता हूँ सुकून की तलाश में लगता है मुझको जैसे मेरा कोई घर नही। चेहरे को ढक को रखता है मुस्कराहटों से ऐसा नहीं है कि उसे कोई फ़िकर नही।  रात की स्याह परछाईया बढ़तीं ही जा रही लगता है इस रात की कोई सहर नही।  पूरे गुलशन में मुझे तितलियां नही दिखी लगता है इस गुलशन में गुलों का शजर नही।  मेरी तमाम खुशियां रहतीं है उस ओर उस ओर जाने को पर कोई डगर नही।  पा लिया इतना जिसका हकदार भी न था अब मौत भी आ जाये तो कोई डर नही।